सुभाष सिंह 'सुमन'
जब तक सच्चाई तक नहीं पहुंचते, तब तक उसे बदल भी नहीं सकते, पर अगर उसे बदल नहीं सकते, तो उस तक पंहुच भी नहीं सकते, इसीलिए उसे अभी छोडो नहीं.
सोमवार, 3 नवंबर 2014
रीढ़ में बर्फ़
शनिवार, 1 नवंबर 2014
#अदम_के_कुफ़्र_की_क़ीमत_चुकाता_आदमी !!
अपनी भी चंद यादें जुङी हैं मोहर्रम से। तब मैं पटना रहा करता था, और हररोज़ ट्यूशन-कोचिंग के चक्कर में, साइकिल से अशोक राजपथ की लंबाई नापा करता था। एक ऐसा ही मोहर्रम और उसका मातमी ताज़िया था। मातम मनाते लोगों ने हम चार दोस्तों को, अपनी-अपनी साइकिल की शहादत का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका दिया था। यक़ीन मानिए, हमारे साइकिलों की शहादत भी हुसैन वाले से कम दर्दनाक न थी। हाँ, उस रोज एक कव्वाल गज़ब अंदाज़ में 'ख्वाज़ा तेरे द्वारे बजे शहनाई' गाये जा रहा था। ये एकमात्र अच्छी याद है।
बाक़ी...दिवाली को फूटे या मोहर्रम को, पटाखों कि फितरत नहीं बदलती दोस्त। तुम नये साल का जश्न मनाने में मस्त हो गये हो, जबकि पटाखों और कानफोङू भोंपूओं से एक बङे तबके की नींद तक गायब है। आज भी कुछ परिंदे हुसैन हो जाएँगे। मातम मनाना है न? कर्बला आज भी लाल होता जाता है। यज़ीदी हररोज़ हुसैन बनाये जाते हैं। दज़ला-फ़रात की पानी भी लाल होकर पीने लायक न रह गयी है। राजधानी दिल्ली के त्रिलोकपुरी का मंज़र भी कर्बलानुमा हुवा जाता है। मेरी पसंदीदा-प्रिय साइकिल सपनों में आज भी गहरे उतरते जाती है। इन्हें सही करते हैं पहले, फ़िर मोहर्रम पर भी बातें की जाएगी।
ताना-बाना
हिन्दुस्तान के महाराष्ट्र में एक परिवार को टुकङों में काटकर रख दिया गया। वजह, वो एक दलित परिवार था।
मुजफ्फरनगर में एक लङकी को ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। वजह, लङकी ने अपने साथ हो रहे छेङछाङ का प्रतिरोध कर दिया।
क्या वाकई में हम सभ्य हुवे हैं? दुनियाभर के तमाम धर्मों ने हमें इतना ही धार्मिक बनाया है, कि हमारी आदमियत कम हो गयी है। धर्म के मठाधीश अभी भी कुतर्क खोजने में व्यस्त होंगे। सुंदरकांड के इस बदसुरत चौपाई को देखिए, "ढोल-गंवार-शूद्र-पशू-नारी, सकल ताङना के अधिकारी"। ऐसा नहीं लगता, कि तमाम धर्मों ने इसी चौपाई वाला रास्ता अख्तियार कर रखा है? क्या इन धर्मों को अब खारिज़ नहीं हो जाना चाहिए। बङे दार्शनिक अरस्तु ने कहा है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और यह सच भी है। मगर तमाम धर्मों-मज़हबों ने अब तलक समाज को असामाजिक बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
बाक़ी, कुछ ऐसे भी स्वघोषित बौद्धिक होंगे, जिन्हें इस पोस्ट से प्रचंड मिर्ची लगेगी। खैर, फतवेबाजों का भी स्वागत।
#वृद्ध_भिच्छुक_विमर्श :: #प्रलाप_का_पुनर्पाठ !!
रोज शाम, ठेके के सामने हर आते-जाते पियक्कङ से दस-दस रुपये माँगते उस बुढ़ापे को लिखना चाहता हूँ। सङक किनारे, अंधेरे में दुबक, नारंगी का पैग बनाते मजदूरों को लिखना चाहता हूँ। रोटी की तलाश में अप्रवासी हो जाने का दर्द लिखना चाहता हूँ। परदेस जा बसे शख्स के पत्नी का विरह लिखना चाहता हूँ। सङक पर मोटर तले दब गये, उस बच्चे की माँ के आँसू लिखना चाहता हूँ। चमचमाते शहर की अंधेरी गलियों के रोङे लिखना चाहता हूँ। एक गरीब घर में पैदा हो, बाजार हो गयी जिस्म लिखना चाहता हूँ। उत्सवधर्मिता के आङ में पटाखों की वकालत करते घिनौने चेहरे लिखना चाहता हूँ। मंदिरों-मज़ारों पर, मन्नतों के बदले चढ़ावे की घुसखोरी पेशकश लिखना चाहता हूँ। बहुत कुछ है, जिसे लिखकर मैं नंगा कर देना चाहता हूँ। पर तभी मंटो कानों में कह जाता है, कि जो खुद ही नंगा है बालक, उसे नंगा करोगे भी तो कैसे?
बाक़ी, कभी मेरे शब्द चूकते हैं प्रिय, तो कभी कोई नंगा नहीं दिख पाता। मजबूरन मैं तुमको लिखना चाहता हूँ, पर तभी उधेङा नोटिस बोर्ड चिल्ला उठता है, कि पहले ज़ेहन से उसे हटा लो फिर हर जगह लिखते रहना।
तभी तो, मैं कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ।
छठ : लोकपर्व
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014
अभिव्यक्ति के खतरे।
लोकतंत्र की बहुत सारी परिभाषाएँ दी गयी। अरस्तु से लेकर लिंकन तक ने इसपर अपने-अपने विचार दिए। लोकतंत्र की आम समझ ये है, कि आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे पहले मिल जाया करती है। वाल्तेयर की एक उक्ति है," हो सकता है, मैं आपके विचारों से असहमत होऊँ, पर आपके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए, मैं अपनी जान तक दे सकता हूँ"। मैं हर लोकतंत्र के लिए वाल्तेयर के इस सिद्धांत को अत्यावश्यक मानता हूँ। अभिव्यक्ति पर होने वाला हर एक प्रहार, लोकतंत्र को फासीवादी व्यवस्था के थोङा और करीब ले जाता है। दरअसल, फासीवाद की पैदाइश, अभिव्यक्ति पर प्रहार किए बिना मुमकिन ही नहीं है।
कल के तारीख में, फाॅरवर्ड पत्रिका के दफ़्तर पर पुलिस ने छापा मारकर, पत्रिका का नया अंक जब्त कर लिया। कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। संपादक प्रमोद रंजन जी, भूमिगत हैं। कभी भी उनकी गिरफ्तारी संभव है। दोष बस इतना, कि पत्रिका ने ज.ने.वि. के कावेरी छात्रावास में आयोजित होनेवाली 'महिषासुर महोत्सव' का समर्थन किया था। रात महोत्सव के दौरान अ.भा.वि.प. की गुंडई का भी प्रदर्शन हुवा। इन घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैचारिक विरोध है, तो विमर्श करो। अपने तर्क पैने करो। उनलोगों ने तुम्हारे पौराणिक घटनाओं को एक नया व्याख्या दिया, बौद्धिक हो तो उसका तार्किक खंडन करके दिखाओ। पर नहीं, ये आपलोगों के बस की बात नहीं। संघ ने आपको लाठी चलाना तो सिखाया, पर कलम का परिचय आपसे दूर ही रह गया। आपको हुल्लङबाजियाँ तो आई, क़िताबों के पन्नों से गुजरने का शउर न आया। आपने लोक के राम-राम को चंद मठाधीशों का जय श्रीराम बनाकर रख दिया है। आपने ठेठ देहातों के मस्जिदों पर भी लाउडस्पीकर टंगवा दिया है।
ज़ेहन में नाजी दौर के कवि 'मार्टिन न्यिमोलर' की कविता घुम रही है:-
"पहले वे, कम्युनिस्टों के लिए आए,
पर मैं कम्युनिस्ट नहीं था, मैं चुप रहा।
फिर वे, समाजवादियों और मजदूर संगठनों के लिए आए,
मैं इनमें से नहीं था, मैं चुप रहा।
फिर वे, यहूदियों के लिए आए,
मैं यहूदी नहीं था, मैं चुप रहा।
और जब वे, मेरे लिए आए,
तो बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था।"
अभिव्यक्ति पर होता प्रहार, धान के पूँज में लगी आग के मानिंद, आपके घर-खेत-खलिहान तक पहुँचे, उसके पहले ही उसका सशक्त प्रतिरोध करो। अगर आज तुम चुप रहे, तो कल तुम्हारी भी बारी आएगी, और तुम्हारे लिए भी कोई नामलेवा न बचेगा।
शनिवार, 27 सितंबर 2014
Bikhre Lafz-17; 6 December 2013
अब और मत मारो मेरे राम को, और ये शौर्यता का कर्कश काक-गायन भी बंद कर लो, प्लीज।
Bikhre Lafz-16;22 December 2013
" कैफ बरदोश, बादलों को न देख,
बेखबर, तू न कुचल जाय कहीं!"
Bikhre Lafz-15; 24 December 2013
महानगरीय समाज में ये एक सामान्य सी घटना है, पर बिहार के गाँव से कुछ बनने की लालसा लिए महानगर आए एक गँवार के आँसुओं का बाँध तोङने को यह पर्याप्त था। क्षमा श्रमजीवी देवता, आपके पैरों की धूलि को अपने मस्तक तक न पहुँचा सका। इस अक्षम इमोशनल गँवार का मौन प्रणाम स्वीकार करना।
Bikhre Lafz-14; 25 Dcember 2013
Bikhre Lafz-13; 26 December 2013
Bikhre Lafz-12; 9 April 2013
पहले कभी,
नदी कहा जाता था,
अब...
मेरा नाम भी,
और मेरा काम भी,
बदल दिया,
तुम्हारे स्वार्थ ने ।।
©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।
Bikhre Lafz-11; 18 April 2013
सुने पथ पर जो तुने बुना ।
यह विपदा कैसी भारी है?
क्या तुमने जीवन हारी है ?
इन नयनों से गिरते आँसू,
हे पथिक! नहीं शोभा देते ।
सिर हाथ दिये क्यों बैठे हो?
ये तनिक नहीं अच्छे लगते ।
उठ दौङ अभी तो रात है,
उस छोर पर प्रभात है ।
क्या हुवा, पाँवों में छाले हैं?
हम तो मन के मतवाले हैं ।
कुछ लोग ही तो छुटे हैं अभी,
इस पथ में छुट जाते हैं सभी ।
तुझे तो एकाकी चलना है,
अभी जीना है, अभी मरना है ।
सर उठा गगन की ओर देख,
सप्तर्षियों का ये शोक देख ।
यह देख ध्रुव भी जलता है,
तुझको चलने को कहता है ।
पथ को आलोकित करने को,
देखो वो आते जुगनु को ।
देखो ये तिमिर भी जाता है,
और उषाकाल भी आता है ।
आ उठ अब मेरे साथ चल,
बनकर के झंझावात चल ।
वो देख वहाँ पीछे अपने,
तुझे बैठ देख हारे कितने ।
उठ सुमन, तु बन आलोक चल,
बन विरह-वेदिनी अग्नि तु जल ।
तुझे जलकर पुलकित होना है,
इस पथ को आलोकित करना है ।
कर तृष्णा का संधान चल,
निज हेतु का अब बलिदान कर ।
हे आर्य! न ऐसे रूकते हैं,
विघ्नों से वीर क्या झुकते हैं ?
सर उठा और हुँकार सुना,
प्रत्यंचा की टंकार सुना ।
बोलो क्या दिनकर डरता है ?
उसको भी राहू डसता है ।
वो अगर कभी रूक जायेगा,
तब प्रलय भयंकर आयेगा ।
वीरों को कभी आराम नहीं,
ये रूकना उसका काम नहीं ।
आ छोङ चले पदचिन्हों को,
आलिंगण कर लें किरणों को ।।
©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।
Bikhre Lafz-10 ; 24 October 2013
क़र्ज़ में डूबा हर तिनका,मिला उसे उपहार में।।
सपनों की खेती करने,पथ पर निकला वो मेहनतकश।
लाया उधार पर कुछ पैसे,निज जीवन को गिरवी रखकर।।
फाड़कर धरती का सीना,बो दिया कुछ बीज उसने।
हड्डियों का हल बनाकर,सींचा फिर अपने लहू से।।
पर हाय! विधाता है तुमको,क्या शर्म जरा भी न आया।
मेहनतकश मजबूरों की,अस्मत को तुने जला डाला।।
दया नहीं है तुममे अगर,ले लो फिर मानव से उधार।
ये प्रश्नचिन्ह लो लगाता हूँ,तुम नहीं हो बेहद उदार।।
कहलाता तो है धरतीपुत्र,पर उसके बच्चे रोते हैं।
रोटी-रोटी चिल्ला-चिल्ला,भूखे-नंगे जमीं पर सोते हैं।।
छोड़ गया एक दिन जहां,दे बेटे को पैतृक उपहार।
घर-घर में था सुखा मातम,पर खुश था बहुत वो साहूकार।।
देता हूँ चुनौती फिर तुझको,मानूंगा तभी तुझे मैं भगवान्।
अगर अस्तित्व है तेरा तो,बनकर दिखला दे एक किसान।।
अंत में भूमिपुत्रों को समर्पित एक कवि के कोमल ह्रदय की संवेदना...
"आँखों में उमड़ते अश्रुमेघ,आवाज गले की रुंधी है..
इस कविता का हर एक शब्द,अपराध-बोध से बंधी है.."
©:- सुभाष सिंह 'सुमन'
(24 अप्रैल 2012)
Bikhre Lafz-9 ; 13 May 2013
1:- मैकियावेली से लगभग 1800 वर्ष पहले आचार्य चाणक्य हुवे. इनके अर्थशास्त्र की बौद्धिक डकैती करके मैकियावेली ने द प्रिंस और द आर्ट आफ वार्स लिखा इसके बावजूद चाणक्य को भारत का मैकियावेली लिखा जाता है ।
2:- नेपोलियन से लगभग 1500 वर्ष पहले सम्राट समुद्रगुप्त हुवे. समुद्रगुप्त ने कई संग्राम बिना एक सैनिक के जीता और मृत्युपरंत विजेता ही रहा पर नेपोलियन कई युद्ध हारा, मरा भी हारकर इसके बावजूद समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहते हैं ।
## डर है, भविष्य का कोई स्वघोषित प्रख्यात इतिहासकार कहीं ये न कह दे कि अशोक प्राचीन भारत का अकबर था ##
Bikhre Lafz-8 ; 16 May 2013
बुरके में करके कैद उसे,
जिंदा ही दफ़ना दिया ।
हंसती रहती थी पहले वो,
उस हंसी की लाश बिछा दिया ।
अम़न के ठेकेदारों का पैग़ाम़ नया आया है,
उन्होंने दोहरा मापदंड अपनाया है ।
Bikhre Lafz-7 ;8 june 2013
Bikhre Lafz-6 ;11 june 2013
भगवान तब भी मरा था जब अग्निपरीक्षा में सफल सीता को वनवास दिया गया था.. भगवान तब भी मरा था जब द्रौपदी का चीरहरण हुवा था.. भगवान तब भी मरा था जब चंड अशोक ने अपने निन्यानवे भाईयों को मौत दिया था.. पृथ्वीराज के साथ भी भगवान ही मरा था.. बाबर ने भी अयोध्या में भगवान को ही मारा था.. बाबरी विध्वंस में भी भगवान ही मरा था.. और गत सोलह दिसंबर को भी दिल्ली में भगवान मरा था.
दरअसल, मनुष्य का इतिहास भगवान की मौतों का इतिहास मात्र है. जिस दिन से इंसान पैदा हुवा है, हर दिन-हर पल कहीं-न-कहीं भगवान मरता ही रहता है.
Bikhre Lafz-5; 25 June 2013
एक आपदा ने कईओं की डूबती नेतागिरी चमकाकर रख दिया...न्यूज वालों को एक-दो सप्ताह का कच्चा माल मिल गया...कुकुरमुत्तों की प्रजाति के समाजसेवियों-स्वयंसेवियों को बैठे-बिठाए पोषण मिल गया...फेसबुकिए महात्माओं को दिन भर स्टैटस अपडेट करने के लिए मसाला मिल गया...धर्मवीरों को अपने-अपने धर्म का औचित्य-महात्म्य समझ आ गया...!!
और क्या चाहिए एक अकेली आपदा से?
मुझे तो अब बस एक और क्लाउड ब्रस्टिंग चाहिए पर इसी दिल्ली में और वो भी लूटियन्स के ऊपर.
Bikhre Lafz-4 ; 11 July2013
क्या पता मेरे जन्मस्थान में ही मेरा भी बुद्धत्व भटक रहा हो.!! वैसे भी बुद्धूवत्व का कुछ भी अंश तिलांजलित होकर बुद्धत्व का रूप ग्रहण कर ले तो ये यायावरी सफल सिद्ध हो जाएगी. .
Bikhre Lafz-3 ; 14 August 2013
जाओ...करवा दो दर्ज राष्ट्रदोह का मुकदमा. मैं तुम्हारे कथित राष्ट्रगान का रत्ती भर भी सम्मान नहीं करता. मैं तुम्हारे जश्न-ए-आज़ादी से कोई ताल्लुकात नहीं रखता.
#फर्जी आज़ादी मुर्दाबाद.
बिखरे लफ्ज़ -2 ; 18 October2013
बिखरे लफ्ज़ -1 ;12 December 2013
पास किसी मस्ज़िद से अज़ान की उठती आवाज़ सर्द हवा में घुल-घुल कर कानों में उतर रही है...और यहाँ चायवाले के पुराने पङ चुके टेलीविजन पर किशोर कुमार गा रहे हैं...'ओ साथी रेऽऽऽऽ...तेरे बिना भी क्या जीना!'
चलिए अब जागिए बंधु...सूरज द़स्तक दे रहा है खिङकियों पर...हम सोने चले...आपसबों को शुभ-दिन। प्रणाम।
बुधवार, 24 सितंबर 2014
धरती के हमारे अपने मंगल
मंगलवार, 23 सितंबर 2014
धार्मिक नंगपना
बाक़ी...रहीम बबवा को भी याद किया जाए, बाबा बोले हैं, और बङा सच बोले हैं, "रहिमन निजमन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि इठिलैंहे लोगसब, बांटि न लैंहे कोय।"
गुरुवार, 6 जनवरी 2011
उसने कहा था,
हम बनायेंगे एक जहां,
हम बसायेंगे एक जहां,
जहाँ गम न होगी,
खुशियाँ किसी को न ज्यादा न कम होगी,
कुछ दिनों के बाद,
वक़्त के थपेड़ों को झेल लेने के बाद,
जब समय ने लिए करवट,
उसने शुरू किया कुछ हरकत,
रिश्ते में तल्खी आई,
कडवाहट ने की मिठास की भरपाई,
कुछ दोषी हम भी थे,
पर निर्दोष वो भी कहाँ थे,
वो भी भूली वादे,
हम भी भुलाने लग गए,
शुरू हुवा फिर से प्यालों का दौर,
वादों को धुंवे में उड़ाने का दौर,
अब जब आया है पुराने साल का अवसान,
नए साल ने खींचा हमारा ध्यान,
नयी शुरुवात करने की कसम लेते हैं,
आपको भी मिले नयी शुरुवात हम दुवा करते हैं.
आज फिर से नींव दरक रही है,
हाथों से हमारी आजादी सरक रही है,
घटा की तरह कोई हमपे छ रहा है,
हा देव! क्या फिर से अंधकार आ रहा है?
इस अँधेरे के अवसान को अन्लपुन्ज दिला दे,
या फिर मेरे सुभाष को संजीवनी पिला दे.....
JAI HIND...........