सोमवार, 3 नवंबर 2014

रीढ़ में बर्फ़

29 सितंबर 2010। अगले दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद पर फैसला होना था। पूरा देश तब चौकन्ना था। रीढ़ की हड्डियों में किसी अनहोनी के भय से हल्का सिहरन भी था। घर से फोन करके अगले दिन काॅलेज न जाने का आदेश आ चुका था। मैं काॅलेज के ठीक सामने, खोपचे(सिगरेटबाजी के अड्डे को यही नाम दिया था हमने) में अकेला बैठा, धुआँ उङाए जा रहा था। अचानक से उसको आता देख मैं हैरान रह गया। खोपचे के तरफ़ देखना भी उस लङकी के लिए गुनाह जैसा था, और उसदिन वो तेज कदमों से अंदर घुसे आ रही थी। उसका चेहरा बता रहा था, कि अगले दिन को लेकर, वो कुछ ज्यादा ही डरी हुवी है। ये पहला और अंतिम मौका था, जब उसने सिगरेट पीता देखकर, मेरे हाथ से छीना नहीं था। मेरे कंधे पर टिककर वो बस इतना कह सकी, सुभाष कल कुछ बुरा तो नहीं होगा न? कुछ देर के लिए मैं उसकी अम्मी हो गया था, और वो एकदम मासूम छोटी बच्ची। मैंने उसे समझा दिया, 'कि बच्चे अब लोग समझदार और परिपक्व हो गये हैं, कुछ भी नहीं होगा, और मैं भी तो अभी ज़िंदा हूँ, तो क्यों परेशान होना।' चिंता के बादल कुछ हद तक हट गये, पर अब भी उसके रीढ़ में बर्फ बाक़ी था। रातभर मैं उसे मैसेज भेज समझाता रहा, तब जाकर अगले दिन काॅलेज आने लायक हिम्मत जुटा पायी। अगला दिन सामान्य ही था। फ़र्क बस इतना, कि काॅलेज खाली-खाली था। क्लासें खाली थी। स्टाफरूम में सारे प्रोफेसर गर्म बहस में व्यस्त थे। हम कुछ देर काॅलेज में टिककर, लालकिले के अंदर टहल रहे थे।अबकी दिल्ली सच में बदली नजर आ रही है। कोरे अफ़वाहों से पल भर में तनाव फैल जा रहा है। तीन ही दिन पहले की तो बात है। मैं घर से निकला और हङबङी में कदम-दर-कदम काढ़ता चला जा रहा था। कहीं पहुँचने की जल्दी थी। कुछ ही दूर चलने पर भयानक सङक जाम सामने था। यूँ तो जाम रहना दिल्ली के सङकों की पहचान है, मगर उसदिन कुछ तो अज़ीब था। कोई ऑटो-बस-फटफटिया आ नहीं रही थी, तो आगे का रास्ता भी पाँव पर लदकर तय करने लगा। तभी फोन पर जानकारी मिली, कि पास के इलाके में कुछ दंगा-फ़साद हो गया है। गोलियाँ चल गयी है। कुछ बसों को जला दिया गया है। कुछ देर के लिए, अनहोनी की आशंका से मैं वाकई सिहर गया था, पर जैसा कि राणा साहब कहते हैं, ज़रूरत आखिरी मंज़िल पर गुरूर बाँध लेती है, मैं आगे बढ़ गया। अगले कुछेक घंटों के बाद स्थिति सामान्य थी। दूसरे दिन घटनाक्रम का पता किया, तो बात बस इतनी थी, कि सबकुछ कोरा अफ़वाह था, मगर इस अफ़वाह ने कइयों को सांशत में डाल दिया। अगले दिन इलाके की स्थिति ऐसी, मानो कोई बवंडर गुजरना बाक़ी रह गया हो। ये खानपुर के पास के संगमविहार इलाके की बात है।अब त्रिलोकपुरी चलिए, वहाँ से मजनूं का टीला और बादली बाॅर्डर होता हुवा बवाना आकर रुक जाइए। कुछ तो है, जो गंधा रहा है दिल्ली में। हवाओं में सल्फ़र तो नहीं, पर अज़ीब-सी महक है। इतना तो तय है, कि जो पक रहा है, वो बहुत बदसुरत और घिनौना तासीर रखता है। दिल्ली को बदहवास नहीं देखा मैने कभी, हाँ 1984 की बदहवासी को सुना-पढ़ा जरूर है।रात वो लङकी सपनों में उसी तरह घुसपैठ कर गयी, जैसे तब खोपचे में आ गयी थी। इसबार उसका चेहरा और नीला पङ गया था। उसने बताया, उसके त्रिलोकपुरी में कुछ दिनों की राहत के बाद, फिर से तनाव की खबर है। मैं अबकी उसे भरोसा नहीं दिला पाया। अरसा गुजर चुका है उससे बात किये। उसका कोई संपर्क भी नहीं। काश, कि आज भी सुभाष उसी भरोसे से उसे कह पाता, 'कि बच्चे अब लोग समझदार और परिपक्व हो गये हैं, कुछ भी नहीं होगा, और मैं भी तो अभी ज़िंदा हूँ, तो क्यों परेशान होना।' कुछ तो है, जो अंदर सङ गया है। शायद वो भरोसा, जो लोगों के समझदारी और परिपक्वता पर था, वो मर गया है।

शनिवार, 1 नवंबर 2014

#‎अदम_के_कुफ़्र_की_क़ीमत_चुकाता_आदमी‬ !!

1334 बरस पहले की बात है। कर्बला के मैदान में, मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को औरतों-बच्चों के साथ, पानी के लिए तङपा-तङपाकर मौत दिया गया था। कुछ और बरस पीछे जाएँ, तो ये हिजरी संवत के लागू होने का दिन था। खैर, आज की तारीख में, इसदिन मुस्लिम लोग, हुसैन के मौत का मातम मनाया करते हैं। ताज़िए निकलते हैं। बम-पटाखे फूटते हैं। बाइकर्स गैंग सङकों के साथ, कानूनों-नियमों की भी माँ-बहन करते हैं।
अपनी भी चंद यादें जुङी हैं मोहर्रम से। तब मैं पटना रहा करता था, और हररोज़ ट्यूशन-कोचिंग के चक्कर में, साइकिल से अशोक राजपथ की लंबाई नापा करता था। एक ऐसा ही मोहर्रम और उसका मातमी ताज़िया था। मातम मनाते लोगों ने हम चार दोस्तों को, अपनी-अपनी साइकिल की शहादत का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका दिया था। यक़ीन मानिए, हमारे साइकिलों की शहादत भी हुसैन वाले से कम दर्दनाक न थी। हाँ, उस रोज एक कव्वाल गज़ब अंदाज़ में 'ख्वाज़ा तेरे द्वारे बजे शहनाई' गाये जा रहा था। ये एकमात्र अच्छी याद है।
बाक़ी...दिवाली को फूटे या मोहर्रम को, पटाखों कि फितरत नहीं बदलती दोस्त। तुम नये साल का जश्न मनाने में मस्त हो गये हो, जबकि पटाखों और कानफोङू भोंपूओं से एक बङे तबके की नींद तक गायब है। आज भी कुछ परिंदे हुसैन हो जाएँगे। मातम मनाना है न? कर्बला आज भी लाल होता जाता है। यज़ीदी हररोज़ हुसैन बनाये जाते हैं। दज़ला-फ़रात की पानी भी लाल होकर पीने लायक न रह गयी है। राजधानी दिल्ली के त्रिलोकपुरी का मंज़र भी कर्बलानुमा हुवा जाता है। मेरी पसंदीदा-प्रिय साइकिल सपनों में आज भी गहरे उतरते जाती है। इन्हें सही करते हैं पहले, फ़िर मोहर्रम पर भी बातें की जाएगी।

ताना-बाना

ईरान में एक औरत को फाँसी पर लटकाया जाता है। वजह, उसने बलात्कृत होने से बगावत कर दिया, और आत्मरक्षा में चाकू चला दिया।
हिन्दुस्तान के महाराष्ट्र में एक परिवार को टुकङों में काटकर रख दिया गया। वजह, वो एक दलित परिवार था।
मुजफ्फरनगर में एक लङकी को ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। वजह, लङकी ने अपने साथ हो रहे छेङछाङ का प्रतिरोध कर दिया।
क्या वाकई में हम सभ्य हुवे हैं? दुनियाभर के तमाम धर्मों ने हमें इतना ही धार्मिक बनाया है, कि हमारी आदमियत कम हो गयी है। धर्म के मठाधीश अभी भी कुतर्क खोजने में व्यस्त होंगे। सुंदरकांड के इस बदसुरत चौपाई को देखिए, "ढोल-गंवार-शूद्र-पशू-नारी, सकल ताङना के अधिकारी"। ऐसा नहीं लगता, कि तमाम धर्मों ने इसी चौपाई वाला रास्ता अख्तियार कर रखा है? क्या इन धर्मों को अब खारिज़ नहीं हो जाना चाहिए। बङे दार्शनिक अरस्तु ने कहा है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और यह सच भी है। मगर तमाम धर्मों-मज़हबों ने अब तलक समाज को असामाजिक बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
बाक़ी, कुछ ऐसे भी स्वघोषित बौद्धिक होंगे, जिन्हें इस पोस्ट से प्रचंड मिर्ची लगेगी। खैर, फतवेबाजों का भी स्वागत।

‪#‎वृद्ध_भिच्छुक_विमर्श‬ :: ‪#‎प्रलाप_का_पुनर्पाठ‬ !!

तुमको मालूम नहीं प्रिये, मैं क्या लिखना चाहता हूँ। हर वो दास्तां जो अलिक्खा रह गया, हर वो पन्ना जिसे फाङ डाला गया। मैं वैदिक विमर्श के उस सिरे को लिखना चाहता हूँ, जहाँ गार्गी गुम हो गयी थी। मैं छः साल में सुहागन बन गयी आयशा का दर्द लिखना चाहता हूँ। मसीह के ज़िंदगी के गायब अट्ठरह बरसों को भी लिख देना चाहता हूँ। मैं नैतिक-धार्मिक लोगों का पेटदर्द लिखना चाहता हूँ।
रोज शाम, ठेके के सामने हर आते-जाते पियक्कङ से दस-दस रुपये माँगते उस बुढ़ापे को लिखना चाहता हूँ। सङक किनारे, अंधेरे में दुबक, नारंगी का पैग बनाते मजदूरों को लिखना चाहता हूँ। रोटी की तलाश में अप्रवासी हो जाने का दर्द लिखना चाहता हूँ। परदेस जा बसे शख्स के पत्नी का विरह लिखना चाहता हूँ। सङक पर मोटर तले दब गये, उस बच्चे की माँ के आँसू लिखना चाहता हूँ। चमचमाते शहर की अंधेरी गलियों के रोङे लिखना चाहता हूँ। एक गरीब घर में पैदा हो, बाजार हो गयी जिस्म लिखना चाहता हूँ। उत्सवधर्मिता के आङ में पटाखों की वकालत करते घिनौने चेहरे लिखना चाहता हूँ। मंदिरों-मज़ारों पर, मन्नतों के बदले चढ़ावे की घुसखोरी पेशकश लिखना चाहता हूँ। बहुत कुछ है, जिसे लिखकर मैं नंगा कर देना चाहता हूँ। पर तभी मंटो कानों में कह जाता है, कि जो खुद ही नंगा है बालक, उसे नंगा करोगे भी तो कैसे?
बाक़ी, कभी मेरे शब्द चूकते हैं प्रिय, तो कभी कोई नंगा नहीं दिख पाता। मजबूरन मैं तुमको लिखना चाहता हूँ, पर तभी उधेङा नोटिस बोर्ड चिल्ला उठता है, कि पहले ज़ेहन से उसे हटा लो फिर हर जगह लिखते रहना।
तभी तो, मैं कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ।

छठ : लोकपर्व

छठ एक लोकपर्व है। एक ऐसा त्योहार जिसमें फणीश्वरनाथ की रचनाओं जैसी महक आती है। आज इसका दूसरा दिन है, खरना। गाँव-जवार महक उठा होगा, अरवा बसमतिया भात और बिना हल्दी-मसाले के चने की दाल की खुशबू से। चार दिनों के इस त्योहार में मुझे दो ही दिन प्रिय लगा करते थे। एक तो आजवाली खरना, कारण यही भात-दाल-पिट्ठा और दुध-भात-गुङ। अभी थथूने फुला-फुलाकर हवाओं में वो महक खोजता हूँ। ये शायद अनुभूति ही है, जो 1200 किलोमीटर दूर तलक मुझे गंध महसूसने के काबिल बना रही है। एक और प्रिय दिन था, अंतिम दिन। लगातार बनते पकवानों(ठेकुवा) को देख जीभ पनियाया रहता था, और आखिरी दिन सुबह के अर्घ्य के बाद उदरस्थ करने का मौका मिल पाता था।
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

अभिव्यक्ति के खतरे।

लोकतंत्र की बहुत सारी परिभाषाएँ दी गयी। अरस्तु से लेकर लिंकन तक ने इसपर अपने-अपने विचार दिए। लोकतंत्र की आम समझ ये है, कि आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे पहले मिल जाया करती है। वाल्तेयर की एक उक्ति है," हो सकता है, मैं आपके विचारों से असहमत होऊँ, पर आपके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए, मैं अपनी जान तक दे सकता हूँ"। मैं हर लोकतंत्र के लिए वाल्तेयर के इस सिद्धांत को अत्यावश्यक मानता हूँ। अभिव्यक्ति पर होने वाला हर एक प्रहार, लोकतंत्र को फासीवादी व्यवस्था के थोङा और करीब ले जाता है। दरअसल, फासीवाद की पैदाइश, अभिव्यक्ति पर प्रहार किए बिना मुमकिन ही नहीं है।
कल के तारीख में, फाॅरवर्ड पत्रिका के दफ़्तर पर पुलिस ने छापा मारकर, पत्रिका का नया अंक जब्त कर लिया। कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। संपादक प्रमोद रंजन जी, भूमिगत हैं। कभी भी उनकी गिरफ्तारी संभव है। दोष बस इतना, कि पत्रिका ने ज.ने.वि. के कावेरी छात्रावास में आयोजित होनेवाली 'महिषासुर महोत्सव' का समर्थन किया था। रात महोत्सव के दौरान अ.भा.वि.प. की गुंडई का भी प्रदर्शन हुवा। इन घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैचारिक विरोध है, तो विमर्श करो। अपने तर्क पैने करो। उनलोगों ने तुम्हारे पौराणिक घटनाओं को एक नया व्याख्या दिया, बौद्धिक हो तो उसका तार्किक खंडन करके दिखाओ। पर नहीं, ये आपलोगों के बस की बात नहीं। संघ ने आपको लाठी चलाना तो सिखाया, पर कलम का परिचय आपसे दूर ही रह गया। आपको हुल्लङबाजियाँ तो आई, क़िताबों के पन्नों से गुजरने का शउर न आया। आपने लोक के राम-राम को चंद मठाधीशों का जय श्रीराम बनाकर रख दिया है। आपने ठेठ देहातों के मस्जिदों पर भी लाउडस्पीकर टंगवा दिया है।
ज़ेहन में नाजी दौर के कवि 'मार्टिन न्यिमोलर' की कविता घुम रही है:-
"पहले वे, कम्युनिस्टों के लिए आए,
पर मैं कम्युनिस्ट नहीं था, मैं चुप रहा।

फिर वे, समाजवादियों और मजदूर संगठनों के लिए आए,
मैं इनमें से नहीं था, मैं चुप रहा।

फिर वे, यहूदियों के लिए आए,
मैं यहूदी नहीं था, मैं चुप रहा।

और जब वे, मेरे लिए आए,
तो बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था।"
अभिव्यक्ति पर होता प्रहार, धान के पूँज में लगी आग के मानिंद, आपके घर-खेत-खलिहान तक पहुँचे, उसके पहले ही उसका सशक्त प्रतिरोध करो। अगर आज तुम चुप रहे, तो कल तुम्हारी भी बारी आएगी, और तुम्हारे लिए भी कोई नामलेवा न बचेगा।

शनिवार, 27 सितंबर 2014

Bikhre Lafz-17; 6 December 2013

मेरे राम को कितने बार मारोगे! तुमको पता भी है, तुम्हारे कथित शौर्य के शोर से मेरे राम को घुटन होती है। तुमने जब गाँधी पर गोलियाँ चलाया था, तब भी मरा था मेरा राम। बाबर ने भी मारा था राम को, और तुमने उसके बदले में फिर से राम को ही मार डाला था।
अब और मत मारो मेरे राम को, और ये शौर्यता का कर्कश काक-गायन भी बंद कर लो, प्लीज।

Bikhre Lafz-16;22 December 2013

उन लम्हों की क़सम, जिसमें तुमने साथ दिया, मेरा मन कुंदन-कुंदन हुवा जाता है, पर पलकों के उठते ही जब आईने में देखता हूँ तब सिर्फ़ देवदास नज़र आता है। बादलों से घिरे दिन में आसमान तकता रहा और तुम्हारा अक्श खोजता रहा। तुम तो ओझल ही रही पर चन्दरवा की सुधा याद आ गयी। वो कहे जा रही थी-
" कैफ बरदोश, बादलों को न देख,
बेखबर, तू न कुचल जाय कहीं!"

Bikhre Lafz-15; 24 December 2013

सङक पर बेतहाशा दौङता वह वृद्ध, जो कि सही से दौङ पाने में भी असमर्थ है, पर पेट का सवाल है उसको दौङना ही होगा। स्काॅर्पियो में बैठे वो रईसज़ादे, जो रूक जाना अपने शान में गुस्ताखी समझते हैं, उस वृद्ध के मजबूरन मैराथन पर अट्टहास करते हैं। और दूसरे तरफ़ बस के खिङकी के पास बैठे हम, जो बस को रूकवा पाने में अक्षम हैं, मौन रूदन करते हैं।
महानगरीय समाज में ये एक सामान्य सी घटना है, पर बिहार के गाँव से कुछ बनने की लालसा लिए महानगर आए एक गँवार के आँसुओं का बाँध तोङने को यह पर्याप्त था। क्षमा श्रमजीवी देवता, आपके पैरों की धूलि को अपने मस्तक तक न पहुँचा सका। इस अक्षम इमोशनल गँवार का मौन प्रणाम स्वीकार करना। 

Bikhre Lafz-14; 25 Dcember 2013

माना कि मंदिर के मूर्ति पर चढ़ने वाले फूल बङे इज्जतदार हो जाते हैं, पर मंदिर के नींव में पङे उपेक्षित ईंटों की प्रासंगिकता को नज़रअंदाज़ न करिए। हम तो नींव में पङे, सीढ़ियाँ बने, स्तंभों को संभाले ईंट-पत्थर ही बनना पसंद करेंगे। देशभक्ति के पैमानों में पाकिस्तानी-चीनी को गोली मारना या गरियाना ही गिनते आए हैं आप। अब सुधरिए और अपने पैमानों को भी सुधारिए। इन हाथों में कलम भी बङे अच्छे लगते हैं।

Bikhre Lafz-13; 26 December 2013

पूस के दोपहरी में होती धूप की बारिश जैसा अहसास होता है, जब वो खुले आँखों के भी सपने में अपने साथ होते हैं। पर जब वापस अपने में लौट आता हूँ तब पूस की रात को ही अपने पास पाता हूँ। सच कहता हूँ...तुम्हारी क़सम, तुम्हारा यूँ बरस जाना अपने-आप में बेहोङ है। मेरे कल्पना से कभी होङ करो तो मानें!

Bikhre Lafz-12; 9 April 2013

मुझे भी,
पहले कभी,
नदी कहा जाता था,
अब...
मेरा नाम भी,
और मेरा काम भी,
बदल दिया,
तुम्हारे स्वार्थ ने ।।

©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।

Bikhre Lafz-11; 18 April 2013

अरे पथिक वो गीत सुना,
सुने पथ पर जो तुने बुना ।

यह विपदा कैसी भारी है?
क्या तुमने जीवन हारी है ?

इन नयनों से गिरते आँसू,
हे पथिक! नहीं शोभा देते ।

सिर हाथ दिये क्यों बैठे हो?
ये तनिक नहीं अच्छे लगते ।

उठ दौङ अभी तो रात है,
उस छोर पर प्रभात है ।

क्या हुवा, पाँवों में छाले हैं?
हम तो मन के मतवाले हैं ।

कुछ लोग ही तो छुटे हैं अभी,
इस पथ में छुट जाते हैं सभी ।

तुझे तो एकाकी चलना है,
अभी जीना है, अभी मरना है ।

सर उठा गगन की ओर देख,
सप्तर्षियों का ये शोक देख ।

यह देख ध्रुव भी जलता है,
तुझको चलने को कहता है ।

पथ को आलोकित करने को,
देखो वो आते जुगनु को ।

देखो ये तिमिर भी जाता है,
और उषाकाल भी आता है ।

आ उठ अब मेरे साथ चल,
बनकर के झंझावात चल ।

वो देख वहाँ पीछे अपने,
तुझे बैठ देख हारे कितने ।

उठ सुमन, तु बन आलोक चल,
बन विरह-वेदिनी अग्नि तु जल ।

तुझे जलकर पुलकित होना है,
इस पथ को आलोकित करना है ।

कर तृष्णा का संधान चल,
निज हेतु का अब बलिदान कर ।

हे आर्य! न ऐसे रूकते हैं,
विघ्नों से वीर क्या झुकते हैं ?

सर उठा और हुँकार सुना,
प्रत्यंचा की टंकार सुना ।

बोलो क्या दिनकर डरता है ?
उसको भी राहू डसता है ।

वो अगर कभी रूक जायेगा,
तब प्रलय भयंकर आयेगा ।

वीरों को कभी आराम नहीं,
ये रूकना उसका काम नहीं ।

आ छोङ चले पदचिन्हों को,
आलिंगण कर लें किरणों को ।।

©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।

Bikhre Lafz-10 ; 24 October 2013

पैदा हुवा वो जब यहाँ,लेकर दुर्भाग्य हाथ में।
क़र्ज़ में डूबा हर तिनका,मिला उसे उपहार में।।

सपनों की खेती करने,पथ पर निकला वो मेहनतकश।
लाया उधार पर कुछ पैसे,निज जीवन को गिरवी रखकर।।

फाड़कर धरती का सीना,बो दिया कुछ बीज उसने।
हड्डियों का हल बनाकर,सींचा फिर अपने लहू से।।

पर हाय! विधाता है तुमको,क्या शर्म जरा भी न आया।
मेहनतकश मजबूरों की,अस्मत को तुने जला डाला।।

दया नहीं है तुममे अगर,ले लो फिर मानव से उधार।
ये प्रश्नचिन्ह लो लगाता हूँ,तुम नहीं हो बेहद उदार।।

कहलाता तो है धरतीपुत्र,पर उसके बच्चे रोते हैं।
रोटी-रोटी चिल्ला-चिल्ला,भूखे-नंगे जमीं पर सोते हैं।।

छोड़ गया एक दिन जहां,दे बेटे को पैतृक उपहार।
घर-घर में था सुखा मातम,पर खुश था बहुत वो साहूकार।।

देता हूँ चुनौती फिर तुझको,मानूंगा तभी तुझे मैं भगवान्।
अगर अस्तित्व है तेरा तो,बनकर दिखला दे एक किसान।।

अंत में भूमिपुत्रों को समर्पित एक कवि के कोमल ह्रदय की संवेदना...
"आँखों में उमड़ते अश्रुमेघ,आवाज गले की रुंधी है..
इस कविता का हर एक शब्द,अपराध-बोध से बंधी है.."

©:- सुभाष सिंह 'सुमन'
(24 अप्रैल 2012)
 

Bikhre Lafz-9 ; 13 May 2013

बौद्धिक दिवालियेपन की बानगी देखिए:-

1:- मैकियावेली से लगभग 1800 वर्ष पहले आचार्य चाणक्य हुवे. इनके अर्थशास्त्र की बौद्धिक डकैती करके मैकियावेली ने द प्रिंस और द आर्ट आफ वार्स लिखा इसके बावजूद चाणक्य को भारत का मैकियावेली लिखा जाता है ।
2:- नेपोलियन से लगभग 1500 वर्ष पहले सम्राट समुद्रगुप्त हुवे. समुद्रगुप्त ने कई संग्राम बिना एक सैनिक के जीता और मृत्युपरंत विजेता ही रहा पर नेपोलियन कई युद्ध हारा, मरा भी हारकर इसके बावजूद समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहते हैं ।
## डर है, भविष्य का कोई स्वघोषित प्रख्यात इतिहासकार कहीं ये न कह दे कि अशोक प्राचीन भारत का अकबर था ##

Bikhre Lafz-8 ; 16 May 2013

उन्होंने दोहरा मापदंड अपनाया है,

बुरके में करके कैद उसे,
जिंदा ही दफ़ना दिया ।
हंसती रहती थी पहले वो,
उस हंसी की लाश बिछा दिया ।
अम़न के ठेकेदारों का पैग़ाम़ नया आया है,
उन्होंने दोहरा मापदंड अपनाया है ।

Bikhre Lafz-7 ;8 june 2013

सभ्यताओं के विकास से सिर्फ़ यही हासिल हुवा है कि हम अब और असभ्य हो गए हैं. पहले हमने सुकरात को मारा, बुद्ध को मारा, महावीर को मारा और अब हर रोज सुकरातों-बुद्धों-महावीरों को मार रहे हैं. सभ्य दिखने वाले बर्बर हो गए हैं हम. आस्था ने हमेशा ही सभ्यता को पराजित किया है. इस आस्थारूपी विकृति से कभी नहीं उबर सकेगा ये समाज और इसीलिए कभी भी सभ्य नहीं हो सकेगा..

Bikhre Lafz-6 ;11 june 2013

नीत्शे के इस कथन पर गौर कीजिए, 'भगवान मर चुका है'.
भगवान तब भी मरा था जब अग्निपरीक्षा में सफल सीता को वनवास दिया गया था.. भगवान तब भी मरा था जब द्रौपदी का चीरहरण हुवा था.. भगवान तब भी मरा था जब चंड अशोक ने अपने निन्यानवे भाईयों को मौत दिया था.. पृथ्वीराज के साथ भी भगवान ही मरा था.. बाबर ने भी अयोध्या में भगवान को ही मारा था.. बाबरी विध्वंस में भी भगवान ही मरा था.. और गत सोलह दिसंबर को भी दिल्ली में भगवान मरा था.
दरअसल, मनुष्य का इतिहास भगवान की मौतों का इतिहास मात्र है. जिस दिन से इंसान पैदा हुवा है, हर दिन-हर पल कहीं-न-कहीं भगवान मरता ही रहता है.

Bikhre Lafz-5; 25 June 2013

आपदाएँ बङे काम की चीज है. यकीन नहीं तो आगे पढ़ लीजिए. 
एक आपदा ने कईओं की डूबती नेतागिरी चमकाकर रख दिया...न्यूज वालों को एक-दो सप्ताह का कच्चा माल मिल गया...कुकुरमुत्तों की प्रजाति के समाजसेवियों-स्वयंसेवियों को बैठे-बिठाए पोषण मिल गया...फेसबुकिए महात्माओं को दिन भर स्टैटस अपडेट करने के लिए मसाला मिल गया...धर्मवीरों को अपने-अपने धर्म का औचित्य-महात्म्य समझ आ गया...!!
और क्या चाहिए एक अकेली आपदा से?
मुझे तो अब बस एक और क्लाउड ब्रस्टिंग चाहिए पर इसी दिल्ली में और वो भी लूटियन्स के ऊपर.

Bikhre Lafz-4 ; 11 July2013

दिल्ली ना तो बुद्ध के लिए उपयुक्त जगह है और ना ही बुद्धू के लिए. मैं ठहरा निपट बुद्धू तो भला मैं कैसे टिक सकता हूँ यहाँ. जा रहा हूँ फिर से कुछ दिनों के लिए. जो जगह बुद्ध को रास आया था वहीं प्रस्थान कर रहा हूँ. बुद्ध के पदचिन्ह खोजने का प्रयास करूँगा. उस मगध को भी थोङा बहुत खोज ही लूँगा इसी प्रयास में जो स्मृतियों में ही जिंदा बचा है.
क्या पता मेरे जन्मस्थान में ही मेरा भी बुद्धत्व भटक रहा हो.!! वैसे भी बुद्धूवत्व का कुछ भी अंश तिलांजलित होकर बुद्धत्व का रूप ग्रहण कर ले तो ये यायावरी सफल सिद्ध हो जाएगी. .

Bikhre Lafz-3 ; 14 August 2013

शर्म बाकी है अभी तक सो कैसे भेज दूँ शुभकामनाएँ और कैसे मनाऊँ जश्न-ए-आज़ादी. खुश होएँ भी तो आखिर किस चीज़ पर:- किश्तवाङ के रंगीन सङकों की खुशी मनाएँ या फिर सैनिकों की मौत पर खुश होएँ. मरते किसानों का जश्न मनाएँ या फिर आदिवासियों के लूटते आबरू पर जश्न हो. खंडित होते देश पर पटाखे फोङें या फिर सरेआम-सरेशाम लूटते जनता की गाढ़ी कमाई की होली हो.
जाओ...करवा दो दर्ज राष्ट्रदोह का मुकदमा. मैं तुम्हारे कथित राष्ट्रगान का रत्ती भर भी सम्मान नहीं करता. मैं तुम्हारे जश्न-ए-आज़ादी से कोई ताल्लुकात नहीं रखता.

#फर्जी आज़ादी मुर्दाबाद.

बिखरे लफ्ज़ -2 ; 18 October2013

देव या देवतुल्य होने की स्वघोषणा ही ब्राह्मणवाद है. ध्यान से देखिए तो हर देश-काल में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिख जाएगा. पौराणिक ब्राह्मणों ने भारत में स्वयं को पृथ्वी पर देवताओं का प्रतिनिधि घोषित करके जो अंधेर कायम किया था उसे शिखर तक पहुँचाने में मोहम्मद-मसीह जैसे पैगम्बरों का स्पष्ट योगदान है. साफ शब्दों में कहूँ तो इस्लाम ब्राह्मणवाद का अरबी संस्करण मात्र है. जिस तरह प्राचीन और मध्य काल के विभिन्न राजाओं-सुल्तानों आदि ने अपने सत्ता-स्वार्थ में 'राजत्व का सिद्धांत'('थ्योरी ऑफ किनशिप') प्रतिपादित किया था उसी तरह इनलोगों ने भी जनशोषण को 'थ्योरी ऑफ ब्राह्मणशिप' और 'थ्योरी ऑफ प्रोफेटशिप' प्रतिपादित किया.


बिखरे लफ्ज़ -1 ;12 December 2013

ये जो ज़िंदगी है, वो कभी रूकी है भला! आप निहारिए अपने वार्डरोब में टँगे कीमती जैकेटों को...और वो चाय वाला हाॅफ टीशर्ट-हाॅफ पैंट में मस्त है। कुछ भी तो नहीं बदला...आप सरकार बनाएँ या ना...पारा लुढ़का करे...अपनी बला से...किसको परवाह है! कम-से-कम उस चायवाले को तो कतई नहीं, जो तङके भोर में साइकिल संभाले मज़दूरों और हम जैसे आव़ारा यायावरों की ठंढ भगा रहा।
पास किसी मस्ज़िद से अज़ान की उठती आवाज़ सर्द हवा में घुल-घुल कर कानों में उतर रही है...और यहाँ चायवाले के पुराने पङ चुके टेलीविजन पर किशोर कुमार गा रहे हैं...'ओ साथी रेऽऽऽऽ...तेरे बिना भी क्या जीना!'
चलिए अब जागिए बंधु...सूरज द़स्तक दे रहा है खिङकियों पर...हम सोने चले...आपसबों को शुभ-दिन। प्रणाम।


बुधवार, 24 सितंबर 2014

धरती के हमारे अपने मंगल

दुनिया बङी है, मगर बहुत छोटी भी है। आप मंगल पहुँचकर मंगलगान गाए जाते हैं। करोड़ों खर्च करके मुबारकवादों का दौर चलाए जाते हैं। आपको मालूम है, कि हमारे शहर के लालबत्तियों पर भी एक दुनिया बसा करती है? वो मंगरू चच्चा की दुनिया उसी लालबत्ती पर टिकी है? लालबत्ती के लाल होते ही, उस शख्स की माँसपेशियाँ उसेन बोल्ट हो जाया करती है। वो शख्स यहाँ-वहाँ दौङ लगाता है। वो चार पहिओं वाली गाङी देख खिल जाया करता है। मर्सिडीज और ऑडी के लोगो की पहचान है उसके पास, हालाँकि ये लोगो वाले लोग बङे भद्दे सलूक करते हैं चच्चा से। चच्चा के पास शीशे में चिपकाने वाले नाॅयलाॅन कवर होते हैं। वो उसे बेचा करते हैं। नाॅयलाॅन उनको गेंहूँ की रोटी देता है। मगर, ठोस इंधन जलाकर राॅकेट छोङने वाले लोग, नाॅयलाॅन से मिलती रोटियों की कद्र नहीं जान पाते, शायद इसीलिए वो मुबारकवाद मनाया करते हैं। चच्चा दिख गये आज, इस बङे-से शहर के एक छोटे-से लालबत्ती पर। मैं उनकी दौङ देख, बदहवास हुवा जाता था। इधर चच्चा के दौङ की कोई चर्चा नहीं, उधर किसी मंगल तलक चले जाने की खबरें जबरन इनबाॅक्स में घुसी आती थी। कुछ पलों तक मुरत बन, शरीर में आंदोलन हुवा। मैं अफ़सोस कर रहा था, कि काश हमारे पास भी चार पहिए होते! अगले ही पल, ख्याल आया, कि अगर हमने भी चार पहिए रखे होते, तो शायद हम भी लोगोवादी लोगों के खेमे की गिनती बढ़ा रहे होते। खैर, मैं दो नाॅयलाॅन खरीद लाया हूँ, ताकि भुख को हर वक़्त महसूस सकूँ। ये भी महसूस सकूँ, कि हमारे देश में, हमारे पास-पङोस में, कई मंगल बसा करते हैं। इन मंगलों पर जीवन होकर भी नहीं है। मठाधीशों को लालबत्तियाँ नहीं दिखा करती। उनको अपने मंहगे लोगो दिखा करते हैं। वो चिथङों को निचोङ, आयातित शराब का चखना बना लिया करते हैं। चच्चा उनके लिए मजे की विषयवस्तु हो जाया करते हैं। उनको दिल्ली में गाली हो चुका 'बिहारी' नहीं दिखाई देता। उनको हिन्दुस्तान में एलियन-सा व्यवहार पाने वाले हमारे पूर्वोत्तरी भाई-बहन नहीं दिखा करते। उनको छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी नहीं दिखा करते। दलित-गरीब लोग उनके चश्मे में ही छन जाया करते हैं। उनके चश्मे को दृष्टिदोष है, और यही दृष्टिदोष उनको मुबारकवादों का मौका दिया करता है।

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

धार्मिक नंगपना

धर्म एक ऐतिहासिक-पुरातन-संगठित राजनीति है। हर देश-काल-समाज में ब्रह्मणवादी लोग हुवे हैं, और इन्हीं के शैतानी दिमागों की उपज धर्म है। अध्यात्म इश्क़ है, विशुद्ध और पवित्र है। सूफिओं  ने खुदा को माशूक माना, इसीलिए सूफ़ीमत, इश्क़ का पवित्रतम रूप है। जमानों ने धर्म और अध्यात्म का घिटमाघिटोर किया है, जबकि ये दोनों ही परस्पर विरोधी धाराएँ हैं। धर्म तर्क(यानि कि कुतर्क) गढ़ता है, अध्यात्म में इसकी गुंजाइश पैदा नहीं होता। धर्म गुलाम बनाता है, अध्यात्म मुक्त करता है। धर्म शब्दाडंवरों का जाल बुनता है, अध्यात्म शब्दों से परे हो, मौन को शरणागत होता है। धर्म बाध्य करता है, धर्म फतवे देता है, धर्म उपदेश देता है, मने आपको बताता है, कि आप जो हैं वो न दिखा करें। अध्यात्म आपको अपना असली चेहरा लेकर सबके सामने आने को कहता है। धर्म में पर्दादारी है, या यूँ कहें कि पर्दादारी ही धर्म है। अध्यात्म हमें आत्मा का नंगा यानि विशुद्ध रूप दिखाता है। आजकल ये जो बाजार हमसब पर हावी हुवा है, ये भी धर्म का ही विकसित और जघन्य चेहरा है। बाजार हमें अच्छा बनाता नहीं, सिर्फ़ अच्छा दिखाता है। अफ़सोस, कि हमने अपने चेहरे पर मुखौटा लगाने का हुनर नहीं जाना, सो हम धर्मद्रोही हैं, वैसे हमें अपने नंगपने पर ही गर्व है। जो मेरे दिमाग में है, वो जगजाहिर है। कोई मिथ्याडंवर नहीं, कोई शब्दजाल नहीं। हम जो हैं, वही दिखना चाहते हैं, और वही दिखते भी रहे हैं। हमसे पर्दादारी न होगा, हमसे मुखौटाबाजी न होगा, हमसे ब्रह्मणवादी न हुवा जाएगा। बुद्ध-महावीर बङे हद तक हिंसक हैं, हमें ओशो प्रभावित करते हैं। जयशंकर प्रसाद आदर्शवादी हैं, हमें मंटो पसंद है। दरअसल, जो नंगा है, उसे कपङे क्यूँकर पहनाना? समाज अपने असली स्वरूप में एकदम नंगा है, और इसका नंगपना बहुत वीभत्स है। इसपर पर्दे डालना राजनीति और धर्म का काम होगा। हम माफ़ी चाहेंगे, हमने अब धर्म और राजनीति से परस्पर दूरी बना लिया है।
बाक़ी...रहीम बबवा को भी याद किया जाए, बाबा बोले हैं, और बङा सच बोले हैं, "रहिमन निजमन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि इठिलैंहे लोगसब, बांटि न लैंहे कोय।"
 

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

उसने कहा था

उसने कहा था,
हम बनायेंगे एक जहां,
हम बसायेंगे एक जहां,
जहाँ गम न होगी,
खुशियाँ किसी को न ज्यादा न कम होगी,
कुछ दिनों के बाद,
वक़्त के थपेड़ों को झेल लेने के बाद,
जब समय ने लिए करवट,
उसने शुरू किया कुछ हरकत,
रिश्ते में तल्खी आई,
कडवाहट ने की मिठास की भरपाई,
कुछ दोषी हम भी थे,
पर निर्दोष वो भी कहाँ थे,
वो भी भूली वादे,
हम भी भुलाने लग गए,
शुरू हुवा फिर से प्यालों का दौर,
वादों को धुंवे में उड़ाने का दौर,
अब जब आया है पुराने साल का अवसान,
नए साल ने खींचा हमारा ध्यान,
नयी शुरुवात करने की कसम लेते हैं,
आपको भी मिले नयी शुरुवात हम दुवा करते हैं.
नेताजी सुभाष को समर्पित...
आज फिर से नींव दरक रही है,
हाथों से हमारी आजादी सरक रही है,
घटा की तरह कोई हमपे छ रहा है,
हा देव! क्या फिर से अंधकार आ रहा है?
इस अँधेरे के अवसान को अन्लपुन्ज दिला दे,
या फिर मेरे सुभाष को संजीवनी पिला दे.....

JAI HIND...........