दुनिया बङी है, मगर बहुत छोटी भी है। आप मंगल पहुँचकर मंगलगान गाए जाते हैं। करोड़ों खर्च करके मुबारकवादों का दौर चलाए जाते हैं। आपको मालूम है, कि हमारे शहर के लालबत्तियों पर भी एक दुनिया बसा करती है? वो मंगरू चच्चा की दुनिया उसी लालबत्ती पर टिकी है? लालबत्ती के लाल होते ही, उस शख्स की माँसपेशियाँ उसेन बोल्ट हो जाया करती है। वो शख्स यहाँ-वहाँ दौङ लगाता है। वो चार पहिओं वाली गाङी देख खिल जाया करता है। मर्सिडीज और ऑडी के लोगो की पहचान है उसके पास, हालाँकि ये लोगो वाले लोग बङे भद्दे सलूक करते हैं चच्चा से। चच्चा के पास शीशे में चिपकाने वाले नाॅयलाॅन कवर होते हैं। वो उसे बेचा करते हैं। नाॅयलाॅन उनको गेंहूँ की रोटी देता है। मगर, ठोस इंधन जलाकर राॅकेट छोङने वाले लोग, नाॅयलाॅन से मिलती रोटियों की कद्र नहीं जान पाते, शायद इसीलिए वो मुबारकवाद मनाया करते हैं। चच्चा दिख गये आज, इस बङे-से शहर के एक छोटे-से लालबत्ती पर। मैं उनकी दौङ देख, बदहवास हुवा जाता था। इधर चच्चा के दौङ की कोई चर्चा नहीं, उधर किसी मंगल तलक चले जाने की खबरें जबरन इनबाॅक्स में घुसी आती थी। कुछ पलों तक मुरत बन, शरीर में आंदोलन हुवा। मैं अफ़सोस कर रहा था, कि काश हमारे पास भी चार पहिए होते! अगले ही पल, ख्याल आया, कि अगर हमने भी चार पहिए रखे होते, तो शायद हम भी लोगोवादी लोगों के खेमे की गिनती बढ़ा रहे होते। खैर, मैं दो नाॅयलाॅन खरीद लाया हूँ, ताकि भुख को हर वक़्त महसूस सकूँ। ये भी महसूस सकूँ, कि हमारे देश में, हमारे पास-पङोस में, कई मंगल बसा करते हैं। इन मंगलों पर जीवन होकर भी नहीं है। मठाधीशों को लालबत्तियाँ नहीं दिखा करती। उनको अपने मंहगे लोगो दिखा करते हैं। वो चिथङों को निचोङ, आयातित शराब का चखना बना लिया करते हैं। चच्चा उनके लिए मजे की विषयवस्तु हो जाया करते हैं। उनको दिल्ली में गाली हो चुका 'बिहारी' नहीं दिखाई देता। उनको हिन्दुस्तान में एलियन-सा व्यवहार पाने वाले हमारे पूर्वोत्तरी भाई-बहन नहीं दिखा करते। उनको छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी नहीं दिखा करते। दलित-गरीब लोग उनके चश्मे में ही छन जाया करते हैं। उनके चश्मे को दृष्टिदोष है, और यही दृष्टिदोष उनको मुबारकवादों का मौका दिया करता है।
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