शनिवार, 27 सितंबर 2014

Bikhre Lafz-3 ; 14 August 2013

शर्म बाकी है अभी तक सो कैसे भेज दूँ शुभकामनाएँ और कैसे मनाऊँ जश्न-ए-आज़ादी. खुश होएँ भी तो आखिर किस चीज़ पर:- किश्तवाङ के रंगीन सङकों की खुशी मनाएँ या फिर सैनिकों की मौत पर खुश होएँ. मरते किसानों का जश्न मनाएँ या फिर आदिवासियों के लूटते आबरू पर जश्न हो. खंडित होते देश पर पटाखे फोङें या फिर सरेआम-सरेशाम लूटते जनता की गाढ़ी कमाई की होली हो.
जाओ...करवा दो दर्ज राष्ट्रदोह का मुकदमा. मैं तुम्हारे कथित राष्ट्रगान का रत्ती भर भी सम्मान नहीं करता. मैं तुम्हारे जश्न-ए-आज़ादी से कोई ताल्लुकात नहीं रखता.

#फर्जी आज़ादी मुर्दाबाद.

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