सोमवार, 3 नवंबर 2014

रीढ़ में बर्फ़

29 सितंबर 2010। अगले दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद पर फैसला होना था। पूरा देश तब चौकन्ना था। रीढ़ की हड्डियों में किसी अनहोनी के भय से हल्का सिहरन भी था। घर से फोन करके अगले दिन काॅलेज न जाने का आदेश आ चुका था। मैं काॅलेज के ठीक सामने, खोपचे(सिगरेटबाजी के अड्डे को यही नाम दिया था हमने) में अकेला बैठा, धुआँ उङाए जा रहा था। अचानक से उसको आता देख मैं हैरान रह गया। खोपचे के तरफ़ देखना भी उस लङकी के लिए गुनाह जैसा था, और उसदिन वो तेज कदमों से अंदर घुसे आ रही थी। उसका चेहरा बता रहा था, कि अगले दिन को लेकर, वो कुछ ज्यादा ही डरी हुवी है। ये पहला और अंतिम मौका था, जब उसने सिगरेट पीता देखकर, मेरे हाथ से छीना नहीं था। मेरे कंधे पर टिककर वो बस इतना कह सकी, सुभाष कल कुछ बुरा तो नहीं होगा न? कुछ देर के लिए मैं उसकी अम्मी हो गया था, और वो एकदम मासूम छोटी बच्ची। मैंने उसे समझा दिया, 'कि बच्चे अब लोग समझदार और परिपक्व हो गये हैं, कुछ भी नहीं होगा, और मैं भी तो अभी ज़िंदा हूँ, तो क्यों परेशान होना।' चिंता के बादल कुछ हद तक हट गये, पर अब भी उसके रीढ़ में बर्फ बाक़ी था। रातभर मैं उसे मैसेज भेज समझाता रहा, तब जाकर अगले दिन काॅलेज आने लायक हिम्मत जुटा पायी। अगला दिन सामान्य ही था। फ़र्क बस इतना, कि काॅलेज खाली-खाली था। क्लासें खाली थी। स्टाफरूम में सारे प्रोफेसर गर्म बहस में व्यस्त थे। हम कुछ देर काॅलेज में टिककर, लालकिले के अंदर टहल रहे थे।अबकी दिल्ली सच में बदली नजर आ रही है। कोरे अफ़वाहों से पल भर में तनाव फैल जा रहा है। तीन ही दिन पहले की तो बात है। मैं घर से निकला और हङबङी में कदम-दर-कदम काढ़ता चला जा रहा था। कहीं पहुँचने की जल्दी थी। कुछ ही दूर चलने पर भयानक सङक जाम सामने था। यूँ तो जाम रहना दिल्ली के सङकों की पहचान है, मगर उसदिन कुछ तो अज़ीब था। कोई ऑटो-बस-फटफटिया आ नहीं रही थी, तो आगे का रास्ता भी पाँव पर लदकर तय करने लगा। तभी फोन पर जानकारी मिली, कि पास के इलाके में कुछ दंगा-फ़साद हो गया है। गोलियाँ चल गयी है। कुछ बसों को जला दिया गया है। कुछ देर के लिए, अनहोनी की आशंका से मैं वाकई सिहर गया था, पर जैसा कि राणा साहब कहते हैं, ज़रूरत आखिरी मंज़िल पर गुरूर बाँध लेती है, मैं आगे बढ़ गया। अगले कुछेक घंटों के बाद स्थिति सामान्य थी। दूसरे दिन घटनाक्रम का पता किया, तो बात बस इतनी थी, कि सबकुछ कोरा अफ़वाह था, मगर इस अफ़वाह ने कइयों को सांशत में डाल दिया। अगले दिन इलाके की स्थिति ऐसी, मानो कोई बवंडर गुजरना बाक़ी रह गया हो। ये खानपुर के पास के संगमविहार इलाके की बात है।अब त्रिलोकपुरी चलिए, वहाँ से मजनूं का टीला और बादली बाॅर्डर होता हुवा बवाना आकर रुक जाइए। कुछ तो है, जो गंधा रहा है दिल्ली में। हवाओं में सल्फ़र तो नहीं, पर अज़ीब-सी महक है। इतना तो तय है, कि जो पक रहा है, वो बहुत बदसुरत और घिनौना तासीर रखता है। दिल्ली को बदहवास नहीं देखा मैने कभी, हाँ 1984 की बदहवासी को सुना-पढ़ा जरूर है।रात वो लङकी सपनों में उसी तरह घुसपैठ कर गयी, जैसे तब खोपचे में आ गयी थी। इसबार उसका चेहरा और नीला पङ गया था। उसने बताया, उसके त्रिलोकपुरी में कुछ दिनों की राहत के बाद, फिर से तनाव की खबर है। मैं अबकी उसे भरोसा नहीं दिला पाया। अरसा गुजर चुका है उससे बात किये। उसका कोई संपर्क भी नहीं। काश, कि आज भी सुभाष उसी भरोसे से उसे कह पाता, 'कि बच्चे अब लोग समझदार और परिपक्व हो गये हैं, कुछ भी नहीं होगा, और मैं भी तो अभी ज़िंदा हूँ, तो क्यों परेशान होना।' कुछ तो है, जो अंदर सङ गया है। शायद वो भरोसा, जो लोगों के समझदारी और परिपक्वता पर था, वो मर गया है।

कोई टिप्पणी नहीं: