शनिवार, 27 सितंबर 2014

बिखरे लफ्ज़ -1 ;12 December 2013

ये जो ज़िंदगी है, वो कभी रूकी है भला! आप निहारिए अपने वार्डरोब में टँगे कीमती जैकेटों को...और वो चाय वाला हाॅफ टीशर्ट-हाॅफ पैंट में मस्त है। कुछ भी तो नहीं बदला...आप सरकार बनाएँ या ना...पारा लुढ़का करे...अपनी बला से...किसको परवाह है! कम-से-कम उस चायवाले को तो कतई नहीं, जो तङके भोर में साइकिल संभाले मज़दूरों और हम जैसे आव़ारा यायावरों की ठंढ भगा रहा।
पास किसी मस्ज़िद से अज़ान की उठती आवाज़ सर्द हवा में घुल-घुल कर कानों में उतर रही है...और यहाँ चायवाले के पुराने पङ चुके टेलीविजन पर किशोर कुमार गा रहे हैं...'ओ साथी रेऽऽऽऽ...तेरे बिना भी क्या जीना!'
चलिए अब जागिए बंधु...सूरज द़स्तक दे रहा है खिङकियों पर...हम सोने चले...आपसबों को शुभ-दिन। प्रणाम।


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