शनिवार, 1 नवंबर 2014

#‎अदम_के_कुफ़्र_की_क़ीमत_चुकाता_आदमी‬ !!

1334 बरस पहले की बात है। कर्बला के मैदान में, मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को औरतों-बच्चों के साथ, पानी के लिए तङपा-तङपाकर मौत दिया गया था। कुछ और बरस पीछे जाएँ, तो ये हिजरी संवत के लागू होने का दिन था। खैर, आज की तारीख में, इसदिन मुस्लिम लोग, हुसैन के मौत का मातम मनाया करते हैं। ताज़िए निकलते हैं। बम-पटाखे फूटते हैं। बाइकर्स गैंग सङकों के साथ, कानूनों-नियमों की भी माँ-बहन करते हैं।
अपनी भी चंद यादें जुङी हैं मोहर्रम से। तब मैं पटना रहा करता था, और हररोज़ ट्यूशन-कोचिंग के चक्कर में, साइकिल से अशोक राजपथ की लंबाई नापा करता था। एक ऐसा ही मोहर्रम और उसका मातमी ताज़िया था। मातम मनाते लोगों ने हम चार दोस्तों को, अपनी-अपनी साइकिल की शहादत का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका दिया था। यक़ीन मानिए, हमारे साइकिलों की शहादत भी हुसैन वाले से कम दर्दनाक न थी। हाँ, उस रोज एक कव्वाल गज़ब अंदाज़ में 'ख्वाज़ा तेरे द्वारे बजे शहनाई' गाये जा रहा था। ये एकमात्र अच्छी याद है।
बाक़ी...दिवाली को फूटे या मोहर्रम को, पटाखों कि फितरत नहीं बदलती दोस्त। तुम नये साल का जश्न मनाने में मस्त हो गये हो, जबकि पटाखों और कानफोङू भोंपूओं से एक बङे तबके की नींद तक गायब है। आज भी कुछ परिंदे हुसैन हो जाएँगे। मातम मनाना है न? कर्बला आज भी लाल होता जाता है। यज़ीदी हररोज़ हुसैन बनाये जाते हैं। दज़ला-फ़रात की पानी भी लाल होकर पीने लायक न रह गयी है। राजधानी दिल्ली के त्रिलोकपुरी का मंज़र भी कर्बलानुमा हुवा जाता है। मेरी पसंदीदा-प्रिय साइकिल सपनों में आज भी गहरे उतरते जाती है। इन्हें सही करते हैं पहले, फ़िर मोहर्रम पर भी बातें की जाएगी।

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