उन लम्हों की क़सम, जिसमें तुमने साथ दिया, मेरा मन कुंदन-कुंदन हुवा जाता है, पर पलकों के उठते ही जब आईने में देखता हूँ तब सिर्फ़ देवदास नज़र आता है। बादलों से घिरे दिन में आसमान तकता रहा और तुम्हारा अक्श खोजता रहा। तुम तो ओझल ही रही पर चन्दरवा की सुधा याद आ गयी। वो कहे जा रही थी-
" कैफ बरदोश, बादलों को न देख,
बेखबर, तू न कुचल जाय कहीं!"
" कैफ बरदोश, बादलों को न देख,
बेखबर, तू न कुचल जाय कहीं!"
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