शनिवार, 1 नवंबर 2014

‪#‎वृद्ध_भिच्छुक_विमर्श‬ :: ‪#‎प्रलाप_का_पुनर्पाठ‬ !!

तुमको मालूम नहीं प्रिये, मैं क्या लिखना चाहता हूँ। हर वो दास्तां जो अलिक्खा रह गया, हर वो पन्ना जिसे फाङ डाला गया। मैं वैदिक विमर्श के उस सिरे को लिखना चाहता हूँ, जहाँ गार्गी गुम हो गयी थी। मैं छः साल में सुहागन बन गयी आयशा का दर्द लिखना चाहता हूँ। मसीह के ज़िंदगी के गायब अट्ठरह बरसों को भी लिख देना चाहता हूँ। मैं नैतिक-धार्मिक लोगों का पेटदर्द लिखना चाहता हूँ।
रोज शाम, ठेके के सामने हर आते-जाते पियक्कङ से दस-दस रुपये माँगते उस बुढ़ापे को लिखना चाहता हूँ। सङक किनारे, अंधेरे में दुबक, नारंगी का पैग बनाते मजदूरों को लिखना चाहता हूँ। रोटी की तलाश में अप्रवासी हो जाने का दर्द लिखना चाहता हूँ। परदेस जा बसे शख्स के पत्नी का विरह लिखना चाहता हूँ। सङक पर मोटर तले दब गये, उस बच्चे की माँ के आँसू लिखना चाहता हूँ। चमचमाते शहर की अंधेरी गलियों के रोङे लिखना चाहता हूँ। एक गरीब घर में पैदा हो, बाजार हो गयी जिस्म लिखना चाहता हूँ। उत्सवधर्मिता के आङ में पटाखों की वकालत करते घिनौने चेहरे लिखना चाहता हूँ। मंदिरों-मज़ारों पर, मन्नतों के बदले चढ़ावे की घुसखोरी पेशकश लिखना चाहता हूँ। बहुत कुछ है, जिसे लिखकर मैं नंगा कर देना चाहता हूँ। पर तभी मंटो कानों में कह जाता है, कि जो खुद ही नंगा है बालक, उसे नंगा करोगे भी तो कैसे?
बाक़ी, कभी मेरे शब्द चूकते हैं प्रिय, तो कभी कोई नंगा नहीं दिख पाता। मजबूरन मैं तुमको लिखना चाहता हूँ, पर तभी उधेङा नोटिस बोर्ड चिल्ला उठता है, कि पहले ज़ेहन से उसे हटा लो फिर हर जगह लिखते रहना।
तभी तो, मैं कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ।

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