गुरुवार, 6 जनवरी 2011

उसने कहा था

उसने कहा था,
हम बनायेंगे एक जहां,
हम बसायेंगे एक जहां,
जहाँ गम न होगी,
खुशियाँ किसी को न ज्यादा न कम होगी,
कुछ दिनों के बाद,
वक़्त के थपेड़ों को झेल लेने के बाद,
जब समय ने लिए करवट,
उसने शुरू किया कुछ हरकत,
रिश्ते में तल्खी आई,
कडवाहट ने की मिठास की भरपाई,
कुछ दोषी हम भी थे,
पर निर्दोष वो भी कहाँ थे,
वो भी भूली वादे,
हम भी भुलाने लग गए,
शुरू हुवा फिर से प्यालों का दौर,
वादों को धुंवे में उड़ाने का दौर,
अब जब आया है पुराने साल का अवसान,
नए साल ने खींचा हमारा ध्यान,
नयी शुरुवात करने की कसम लेते हैं,
आपको भी मिले नयी शुरुवात हम दुवा करते हैं.
नेताजी सुभाष को समर्पित...
आज फिर से नींव दरक रही है,
हाथों से हमारी आजादी सरक रही है,
घटा की तरह कोई हमपे छ रहा है,
हा देव! क्या फिर से अंधकार आ रहा है?
इस अँधेरे के अवसान को अन्लपुन्ज दिला दे,
या फिर मेरे सुभाष को संजीवनी पिला दे.....

JAI HIND...........