अरे पथिक वो गीत सुना,
सुने पथ पर जो तुने बुना ।
यह विपदा कैसी भारी है?
क्या तुमने जीवन हारी है ?
इन नयनों से गिरते आँसू,
हे पथिक! नहीं शोभा देते ।
सिर हाथ दिये क्यों बैठे हो?
ये तनिक नहीं अच्छे लगते ।
उठ दौङ अभी तो रात है,
उस छोर पर प्रभात है ।
क्या हुवा, पाँवों में छाले हैं?
हम तो मन के मतवाले हैं ।
कुछ लोग ही तो छुटे हैं अभी,
इस पथ में छुट जाते हैं सभी ।
तुझे तो एकाकी चलना है,
अभी जीना है, अभी मरना है ।
सर उठा गगन की ओर देख,
सप्तर्षियों का ये शोक देख ।
यह देख ध्रुव भी जलता है,
तुझको चलने को कहता है ।
पथ को आलोकित करने को,
देखो वो आते जुगनु को ।
देखो ये तिमिर भी जाता है,
और उषाकाल भी आता है ।
आ उठ अब मेरे साथ चल,
बनकर के झंझावात चल ।
वो देख वहाँ पीछे अपने,
तुझे बैठ देख हारे कितने ।
उठ सुमन, तु बन आलोक चल,
बन विरह-वेदिनी अग्नि तु जल ।
तुझे जलकर पुलकित होना है,
इस पथ को आलोकित करना है ।
कर तृष्णा का संधान चल,
निज हेतु का अब बलिदान कर ।
हे आर्य! न ऐसे रूकते हैं,
विघ्नों से वीर क्या झुकते हैं ?
सर उठा और हुँकार सुना,
प्रत्यंचा की टंकार सुना ।
बोलो क्या दिनकर डरता है ?
उसको भी राहू डसता है ।
वो अगर कभी रूक जायेगा,
तब प्रलय भयंकर आयेगा ।
वीरों को कभी आराम नहीं,
ये रूकना उसका काम नहीं ।
आ छोङ चले पदचिन्हों को,
आलिंगण कर लें किरणों को ।।
©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।
सुने पथ पर जो तुने बुना ।
यह विपदा कैसी भारी है?
क्या तुमने जीवन हारी है ?
इन नयनों से गिरते आँसू,
हे पथिक! नहीं शोभा देते ।
सिर हाथ दिये क्यों बैठे हो?
ये तनिक नहीं अच्छे लगते ।
उठ दौङ अभी तो रात है,
उस छोर पर प्रभात है ।
क्या हुवा, पाँवों में छाले हैं?
हम तो मन के मतवाले हैं ।
कुछ लोग ही तो छुटे हैं अभी,
इस पथ में छुट जाते हैं सभी ।
तुझे तो एकाकी चलना है,
अभी जीना है, अभी मरना है ।
सर उठा गगन की ओर देख,
सप्तर्षियों का ये शोक देख ।
यह देख ध्रुव भी जलता है,
तुझको चलने को कहता है ।
पथ को आलोकित करने को,
देखो वो आते जुगनु को ।
देखो ये तिमिर भी जाता है,
और उषाकाल भी आता है ।
आ उठ अब मेरे साथ चल,
बनकर के झंझावात चल ।
वो देख वहाँ पीछे अपने,
तुझे बैठ देख हारे कितने ।
उठ सुमन, तु बन आलोक चल,
बन विरह-वेदिनी अग्नि तु जल ।
तुझे जलकर पुलकित होना है,
इस पथ को आलोकित करना है ।
कर तृष्णा का संधान चल,
निज हेतु का अब बलिदान कर ।
हे आर्य! न ऐसे रूकते हैं,
विघ्नों से वीर क्या झुकते हैं ?
सर उठा और हुँकार सुना,
प्रत्यंचा की टंकार सुना ।
बोलो क्या दिनकर डरता है ?
उसको भी राहू डसता है ।
वो अगर कभी रूक जायेगा,
तब प्रलय भयंकर आयेगा ।
वीरों को कभी आराम नहीं,
ये रूकना उसका काम नहीं ।
आ छोङ चले पदचिन्हों को,
आलिंगण कर लें किरणों को ।।
©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।
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