शनिवार, 27 सितंबर 2014

Bikhre Lafz-11; 18 April 2013

अरे पथिक वो गीत सुना,
सुने पथ पर जो तुने बुना ।

यह विपदा कैसी भारी है?
क्या तुमने जीवन हारी है ?

इन नयनों से गिरते आँसू,
हे पथिक! नहीं शोभा देते ।

सिर हाथ दिये क्यों बैठे हो?
ये तनिक नहीं अच्छे लगते ।

उठ दौङ अभी तो रात है,
उस छोर पर प्रभात है ।

क्या हुवा, पाँवों में छाले हैं?
हम तो मन के मतवाले हैं ।

कुछ लोग ही तो छुटे हैं अभी,
इस पथ में छुट जाते हैं सभी ।

तुझे तो एकाकी चलना है,
अभी जीना है, अभी मरना है ।

सर उठा गगन की ओर देख,
सप्तर्षियों का ये शोक देख ।

यह देख ध्रुव भी जलता है,
तुझको चलने को कहता है ।

पथ को आलोकित करने को,
देखो वो आते जुगनु को ।

देखो ये तिमिर भी जाता है,
और उषाकाल भी आता है ।

आ उठ अब मेरे साथ चल,
बनकर के झंझावात चल ।

वो देख वहाँ पीछे अपने,
तुझे बैठ देख हारे कितने ।

उठ सुमन, तु बन आलोक चल,
बन विरह-वेदिनी अग्नि तु जल ।

तुझे जलकर पुलकित होना है,
इस पथ को आलोकित करना है ।

कर तृष्णा का संधान चल,
निज हेतु का अब बलिदान कर ।

हे आर्य! न ऐसे रूकते हैं,
विघ्नों से वीर क्या झुकते हैं ?

सर उठा और हुँकार सुना,
प्रत्यंचा की टंकार सुना ।

बोलो क्या दिनकर डरता है ?
उसको भी राहू डसता है ।

वो अगर कभी रूक जायेगा,
तब प्रलय भयंकर आयेगा ।

वीरों को कभी आराम नहीं,
ये रूकना उसका काम नहीं ।

आ छोङ चले पदचिन्हों को,
आलिंगण कर लें किरणों को ।।

©:- सुभाष सिंह 'सुमन'...।।

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