धर्म एक ऐतिहासिक-पुरातन-संगठित राजनीति है। हर देश-काल-समाज में ब्रह्मणवादी लोग हुवे हैं, और इन्हीं के शैतानी दिमागों की उपज धर्म है। अध्यात्म इश्क़ है, विशुद्ध और पवित्र है। सूफिओं ने खुदा को माशूक माना, इसीलिए सूफ़ीमत, इश्क़ का पवित्रतम रूप है। जमानों ने धर्म और अध्यात्म का घिटमाघिटोर किया है, जबकि ये दोनों ही परस्पर विरोधी धाराएँ हैं। धर्म तर्क(यानि कि कुतर्क) गढ़ता है, अध्यात्म में इसकी गुंजाइश पैदा नहीं होता। धर्म गुलाम बनाता है, अध्यात्म मुक्त करता है। धर्म शब्दाडंवरों का जाल बुनता है, अध्यात्म शब्दों से परे हो, मौन को शरणागत होता है। धर्म बाध्य करता है, धर्म फतवे देता है, धर्म उपदेश देता है, मने आपको बताता है, कि आप जो हैं वो न दिखा करें। अध्यात्म आपको अपना असली चेहरा लेकर सबके सामने आने को कहता है। धर्म में पर्दादारी है, या यूँ कहें कि पर्दादारी ही धर्म है। अध्यात्म हमें आत्मा का नंगा यानि विशुद्ध रूप दिखाता है। आजकल ये जो बाजार हमसब पर हावी हुवा है, ये भी धर्म का ही विकसित और जघन्य चेहरा है। बाजार हमें अच्छा बनाता नहीं, सिर्फ़ अच्छा दिखाता है। अफ़सोस, कि हमने अपने चेहरे पर मुखौटा लगाने का हुनर नहीं जाना, सो हम धर्मद्रोही हैं, वैसे हमें अपने नंगपने पर ही गर्व है। जो मेरे दिमाग में है, वो जगजाहिर है। कोई मिथ्याडंवर नहीं, कोई शब्दजाल नहीं। हम जो हैं, वही दिखना चाहते हैं, और वही दिखते भी रहे हैं। हमसे पर्दादारी न होगा, हमसे मुखौटाबाजी न होगा, हमसे ब्रह्मणवादी न हुवा जाएगा। बुद्ध-महावीर बङे हद तक हिंसक हैं, हमें ओशो प्रभावित करते हैं। जयशंकर प्रसाद आदर्शवादी हैं, हमें मंटो पसंद है। दरअसल, जो नंगा है, उसे कपङे क्यूँकर पहनाना? समाज अपने असली स्वरूप में एकदम नंगा है, और इसका नंगपना बहुत वीभत्स है। इसपर पर्दे डालना राजनीति और धर्म का काम होगा। हम माफ़ी चाहेंगे, हमने अब धर्म और राजनीति से परस्पर दूरी बना लिया है।
बाक़ी...रहीम बबवा को भी याद किया जाए, बाबा बोले हैं, और बङा सच बोले हैं, "रहिमन निजमन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि इठिलैंहे लोगसब, बांटि न लैंहे कोय।"