छठ एक लोकपर्व है। एक ऐसा त्योहार जिसमें फणीश्वरनाथ की रचनाओं जैसी महक आती है। आज इसका दूसरा दिन है, खरना। गाँव-जवार महक उठा होगा, अरवा बसमतिया भात और बिना हल्दी-मसाले के चने की दाल की खुशबू से। चार दिनों के इस त्योहार में मुझे दो ही दिन प्रिय लगा करते थे। एक तो आजवाली खरना, कारण यही भात-दाल-पिट्ठा और दुध-भात-गुङ। अभी थथूने फुला-फुलाकर हवाओं में वो महक खोजता हूँ। ये शायद अनुभूति ही है, जो 1200 किलोमीटर दूर तलक मुझे गंध महसूसने के काबिल बना रही है। एक और प्रिय दिन था, अंतिम दिन। लगातार बनते पकवानों(ठेकुवा) को देख जीभ पनियाया रहता था, और आखिरी दिन सुबह के अर्घ्य के बाद उदरस्थ करने का मौका मिल पाता था।
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।
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