लोकतंत्र की बहुत सारी परिभाषाएँ दी गयी। अरस्तु से लेकर लिंकन तक ने इसपर अपने-अपने विचार दिए। लोकतंत्र की आम समझ ये है, कि आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे पहले मिल जाया करती है। वाल्तेयर की एक उक्ति है," हो सकता है, मैं आपके विचारों से असहमत होऊँ, पर आपके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए, मैं अपनी जान तक दे सकता हूँ"। मैं हर लोकतंत्र के लिए वाल्तेयर के इस सिद्धांत को अत्यावश्यक मानता हूँ। अभिव्यक्ति पर होने वाला हर एक प्रहार, लोकतंत्र को फासीवादी व्यवस्था के थोङा और करीब ले जाता है। दरअसल, फासीवाद की पैदाइश, अभिव्यक्ति पर प्रहार किए बिना मुमकिन ही नहीं है।
कल के तारीख में, फाॅरवर्ड पत्रिका के दफ़्तर पर पुलिस ने छापा मारकर, पत्रिका का नया अंक जब्त कर लिया। कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। संपादक प्रमोद रंजन जी, भूमिगत हैं। कभी भी उनकी गिरफ्तारी संभव है। दोष बस इतना, कि पत्रिका ने ज.ने.वि. के कावेरी छात्रावास में आयोजित होनेवाली 'महिषासुर महोत्सव' का समर्थन किया था। रात महोत्सव के दौरान अ.भा.वि.प. की गुंडई का भी प्रदर्शन हुवा। इन घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैचारिक विरोध है, तो विमर्श करो। अपने तर्क पैने करो। उनलोगों ने तुम्हारे पौराणिक घटनाओं को एक नया व्याख्या दिया, बौद्धिक हो तो उसका तार्किक खंडन करके दिखाओ। पर नहीं, ये आपलोगों के बस की बात नहीं। संघ ने आपको लाठी चलाना तो सिखाया, पर कलम का परिचय आपसे दूर ही रह गया। आपको हुल्लङबाजियाँ तो आई, क़िताबों के पन्नों से गुजरने का शउर न आया। आपने लोक के राम-राम को चंद मठाधीशों का जय श्रीराम बनाकर रख दिया है। आपने ठेठ देहातों के मस्जिदों पर भी लाउडस्पीकर टंगवा दिया है।
ज़ेहन में नाजी दौर के कवि 'मार्टिन न्यिमोलर' की कविता घुम रही है:-
"पहले वे, कम्युनिस्टों के लिए आए,
पर मैं कम्युनिस्ट नहीं था, मैं चुप रहा।
फिर वे, समाजवादियों और मजदूर संगठनों के लिए आए,
मैं इनमें से नहीं था, मैं चुप रहा।
फिर वे, यहूदियों के लिए आए,
मैं यहूदी नहीं था, मैं चुप रहा।
और जब वे, मेरे लिए आए,
तो बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था।"
अभिव्यक्ति पर होता प्रहार, धान के पूँज में लगी आग के मानिंद, आपके घर-खेत-खलिहान तक पहुँचे, उसके पहले ही उसका सशक्त प्रतिरोध करो। अगर आज तुम चुप रहे, तो कल तुम्हारी भी बारी आएगी, और तुम्हारे लिए भी कोई नामलेवा न बचेगा।
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