जब तक सच्चाई तक नहीं पहुंचते, तब तक उसे बदल भी नहीं सकते, पर अगर उसे बदल नहीं सकते, तो उस तक पंहुच भी नहीं सकते, इसीलिए उसे अभी छोडो नहीं.
सोमवार, 3 नवंबर 2014
रीढ़ में बर्फ़
लेबल:
१९८४,
अयोध्या,
त्रिलोकपुरी,
दंगा,
दिल्ली,
बाबरी मस्जिद,
राममंदिर
शनिवार, 1 नवंबर 2014
#अदम_के_कुफ़्र_की_क़ीमत_चुकाता_आदमी !!
1334 बरस पहले की बात है। कर्बला के मैदान में, मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को औरतों-बच्चों के साथ, पानी के लिए तङपा-तङपाकर मौत दिया गया था। कुछ और बरस पीछे जाएँ, तो ये हिजरी संवत के लागू होने का दिन था। खैर, आज की तारीख में, इसदिन मुस्लिम लोग, हुसैन के मौत का मातम मनाया करते हैं। ताज़िए निकलते हैं। बम-पटाखे फूटते हैं। बाइकर्स गैंग सङकों के साथ, कानूनों-नियमों की भी माँ-बहन करते हैं।
अपनी भी चंद यादें जुङी हैं मोहर्रम से। तब मैं पटना रहा करता था, और हररोज़ ट्यूशन-कोचिंग के चक्कर में, साइकिल से अशोक राजपथ की लंबाई नापा करता था। एक ऐसा ही मोहर्रम और उसका मातमी ताज़िया था। मातम मनाते लोगों ने हम चार दोस्तों को, अपनी-अपनी साइकिल की शहादत का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका दिया था। यक़ीन मानिए, हमारे साइकिलों की शहादत भी हुसैन वाले से कम दर्दनाक न थी। हाँ, उस रोज एक कव्वाल गज़ब अंदाज़ में 'ख्वाज़ा तेरे द्वारे बजे शहनाई' गाये जा रहा था। ये एकमात्र अच्छी याद है।
बाक़ी...दिवाली को फूटे या मोहर्रम को, पटाखों कि फितरत नहीं बदलती दोस्त। तुम नये साल का जश्न मनाने में मस्त हो गये हो, जबकि पटाखों और कानफोङू भोंपूओं से एक बङे तबके की नींद तक गायब है। आज भी कुछ परिंदे हुसैन हो जाएँगे। मातम मनाना है न? कर्बला आज भी लाल होता जाता है। यज़ीदी हररोज़ हुसैन बनाये जाते हैं। दज़ला-फ़रात की पानी भी लाल होकर पीने लायक न रह गयी है। राजधानी दिल्ली के त्रिलोकपुरी का मंज़र भी कर्बलानुमा हुवा जाता है। मेरी पसंदीदा-प्रिय साइकिल सपनों में आज भी गहरे उतरते जाती है। इन्हें सही करते हैं पहले, फ़िर मोहर्रम पर भी बातें की जाएगी।
अपनी भी चंद यादें जुङी हैं मोहर्रम से। तब मैं पटना रहा करता था, और हररोज़ ट्यूशन-कोचिंग के चक्कर में, साइकिल से अशोक राजपथ की लंबाई नापा करता था। एक ऐसा ही मोहर्रम और उसका मातमी ताज़िया था। मातम मनाते लोगों ने हम चार दोस्तों को, अपनी-अपनी साइकिल की शहादत का प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका दिया था। यक़ीन मानिए, हमारे साइकिलों की शहादत भी हुसैन वाले से कम दर्दनाक न थी। हाँ, उस रोज एक कव्वाल गज़ब अंदाज़ में 'ख्वाज़ा तेरे द्वारे बजे शहनाई' गाये जा रहा था। ये एकमात्र अच्छी याद है।
बाक़ी...दिवाली को फूटे या मोहर्रम को, पटाखों कि फितरत नहीं बदलती दोस्त। तुम नये साल का जश्न मनाने में मस्त हो गये हो, जबकि पटाखों और कानफोङू भोंपूओं से एक बङे तबके की नींद तक गायब है। आज भी कुछ परिंदे हुसैन हो जाएँगे। मातम मनाना है न? कर्बला आज भी लाल होता जाता है। यज़ीदी हररोज़ हुसैन बनाये जाते हैं। दज़ला-फ़रात की पानी भी लाल होकर पीने लायक न रह गयी है। राजधानी दिल्ली के त्रिलोकपुरी का मंज़र भी कर्बलानुमा हुवा जाता है। मेरी पसंदीदा-प्रिय साइकिल सपनों में आज भी गहरे उतरते जाती है। इन्हें सही करते हैं पहले, फ़िर मोहर्रम पर भी बातें की जाएगी।
ताना-बाना
ईरान में एक औरत को फाँसी पर लटकाया जाता है। वजह, उसने बलात्कृत होने से बगावत कर दिया, और आत्मरक्षा में चाकू चला दिया।
हिन्दुस्तान के महाराष्ट्र में एक परिवार को टुकङों में काटकर रख दिया गया। वजह, वो एक दलित परिवार था।
मुजफ्फरनगर में एक लङकी को ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। वजह, लङकी ने अपने साथ हो रहे छेङछाङ का प्रतिरोध कर दिया।
क्या वाकई में हम सभ्य हुवे हैं? दुनियाभर के तमाम धर्मों ने हमें इतना ही धार्मिक बनाया है, कि हमारी आदमियत कम हो गयी है। धर्म के मठाधीश अभी भी कुतर्क खोजने में व्यस्त होंगे। सुंदरकांड के इस बदसुरत चौपाई को देखिए, "ढोल-गंवार-शूद्र-पशू-नारी, सकल ताङना के अधिकारी"। ऐसा नहीं लगता, कि तमाम धर्मों ने इसी चौपाई वाला रास्ता अख्तियार कर रखा है? क्या इन धर्मों को अब खारिज़ नहीं हो जाना चाहिए। बङे दार्शनिक अरस्तु ने कहा है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और यह सच भी है। मगर तमाम धर्मों-मज़हबों ने अब तलक समाज को असामाजिक बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
बाक़ी, कुछ ऐसे भी स्वघोषित बौद्धिक होंगे, जिन्हें इस पोस्ट से प्रचंड मिर्ची लगेगी। खैर, फतवेबाजों का भी स्वागत।
हिन्दुस्तान के महाराष्ट्र में एक परिवार को टुकङों में काटकर रख दिया गया। वजह, वो एक दलित परिवार था।
मुजफ्फरनगर में एक लङकी को ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। वजह, लङकी ने अपने साथ हो रहे छेङछाङ का प्रतिरोध कर दिया।
क्या वाकई में हम सभ्य हुवे हैं? दुनियाभर के तमाम धर्मों ने हमें इतना ही धार्मिक बनाया है, कि हमारी आदमियत कम हो गयी है। धर्म के मठाधीश अभी भी कुतर्क खोजने में व्यस्त होंगे। सुंदरकांड के इस बदसुरत चौपाई को देखिए, "ढोल-गंवार-शूद्र-पशू-नारी, सकल ताङना के अधिकारी"। ऐसा नहीं लगता, कि तमाम धर्मों ने इसी चौपाई वाला रास्ता अख्तियार कर रखा है? क्या इन धर्मों को अब खारिज़ नहीं हो जाना चाहिए। बङे दार्शनिक अरस्तु ने कहा है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और यह सच भी है। मगर तमाम धर्मों-मज़हबों ने अब तलक समाज को असामाजिक बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
बाक़ी, कुछ ऐसे भी स्वघोषित बौद्धिक होंगे, जिन्हें इस पोस्ट से प्रचंड मिर्ची लगेगी। खैर, फतवेबाजों का भी स्वागत।
#वृद्ध_भिच्छुक_विमर्श :: #प्रलाप_का_पुनर्पाठ !!
तुमको मालूम नहीं प्रिये, मैं क्या लिखना चाहता हूँ। हर वो दास्तां जो अलिक्खा रह गया, हर वो पन्ना जिसे फाङ डाला गया। मैं वैदिक विमर्श के उस सिरे को लिखना चाहता हूँ, जहाँ गार्गी गुम हो गयी थी। मैं छः साल में सुहागन बन गयी आयशा का दर्द लिखना चाहता हूँ। मसीह के ज़िंदगी के गायब अट्ठरह बरसों को भी लिख देना चाहता हूँ। मैं नैतिक-धार्मिक लोगों का पेटदर्द लिखना चाहता हूँ।
रोज शाम, ठेके के सामने हर आते-जाते पियक्कङ से दस-दस रुपये माँगते उस बुढ़ापे को लिखना चाहता हूँ। सङक किनारे, अंधेरे में दुबक, नारंगी का पैग बनाते मजदूरों को लिखना चाहता हूँ। रोटी की तलाश में अप्रवासी हो जाने का दर्द लिखना चाहता हूँ। परदेस जा बसे शख्स के पत्नी का विरह लिखना चाहता हूँ। सङक पर मोटर तले दब गये, उस बच्चे की माँ के आँसू लिखना चाहता हूँ। चमचमाते शहर की अंधेरी गलियों के रोङे लिखना चाहता हूँ। एक गरीब घर में पैदा हो, बाजार हो गयी जिस्म लिखना चाहता हूँ। उत्सवधर्मिता के आङ में पटाखों की वकालत करते घिनौने चेहरे लिखना चाहता हूँ। मंदिरों-मज़ारों पर, मन्नतों के बदले चढ़ावे की घुसखोरी पेशकश लिखना चाहता हूँ। बहुत कुछ है, जिसे लिखकर मैं नंगा कर देना चाहता हूँ। पर तभी मंटो कानों में कह जाता है, कि जो खुद ही नंगा है बालक, उसे नंगा करोगे भी तो कैसे?
बाक़ी, कभी मेरे शब्द चूकते हैं प्रिय, तो कभी कोई नंगा नहीं दिख पाता। मजबूरन मैं तुमको लिखना चाहता हूँ, पर तभी उधेङा नोटिस बोर्ड चिल्ला उठता है, कि पहले ज़ेहन से उसे हटा लो फिर हर जगह लिखते रहना।
तभी तो, मैं कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ।
रोज शाम, ठेके के सामने हर आते-जाते पियक्कङ से दस-दस रुपये माँगते उस बुढ़ापे को लिखना चाहता हूँ। सङक किनारे, अंधेरे में दुबक, नारंगी का पैग बनाते मजदूरों को लिखना चाहता हूँ। रोटी की तलाश में अप्रवासी हो जाने का दर्द लिखना चाहता हूँ। परदेस जा बसे शख्स के पत्नी का विरह लिखना चाहता हूँ। सङक पर मोटर तले दब गये, उस बच्चे की माँ के आँसू लिखना चाहता हूँ। चमचमाते शहर की अंधेरी गलियों के रोङे लिखना चाहता हूँ। एक गरीब घर में पैदा हो, बाजार हो गयी जिस्म लिखना चाहता हूँ। उत्सवधर्मिता के आङ में पटाखों की वकालत करते घिनौने चेहरे लिखना चाहता हूँ। मंदिरों-मज़ारों पर, मन्नतों के बदले चढ़ावे की घुसखोरी पेशकश लिखना चाहता हूँ। बहुत कुछ है, जिसे लिखकर मैं नंगा कर देना चाहता हूँ। पर तभी मंटो कानों में कह जाता है, कि जो खुद ही नंगा है बालक, उसे नंगा करोगे भी तो कैसे?
बाक़ी, कभी मेरे शब्द चूकते हैं प्रिय, तो कभी कोई नंगा नहीं दिख पाता। मजबूरन मैं तुमको लिखना चाहता हूँ, पर तभी उधेङा नोटिस बोर्ड चिल्ला उठता है, कि पहले ज़ेहन से उसे हटा लो फिर हर जगह लिखते रहना।
तभी तो, मैं कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ।
छठ : लोकपर्व
छठ एक लोकपर्व है। एक ऐसा त्योहार जिसमें फणीश्वरनाथ की रचनाओं जैसी महक आती है। आज इसका दूसरा दिन है, खरना। गाँव-जवार महक उठा होगा, अरवा बसमतिया भात और बिना हल्दी-मसाले के चने की दाल की खुशबू से। चार दिनों के इस त्योहार में मुझे दो ही दिन प्रिय लगा करते थे। एक तो आजवाली खरना, कारण यही भात-दाल-पिट्ठा और दुध-भात-गुङ। अभी थथूने फुला-फुलाकर हवाओं में वो महक खोजता हूँ। ये शायद अनुभूति ही है, जो 1200 किलोमीटर दूर तलक मुझे गंध महसूसने के काबिल बना रही है। एक और प्रिय दिन था, अंतिम दिन। लगातार बनते पकवानों(ठेकुवा) को देख जीभ पनियाया रहता था, और आखिरी दिन सुबह के अर्घ्य के बाद उदरस्थ करने का मौका मिल पाता था।
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।
बाक़ी, इस पर्व की सबसे बङी खासियत, कि पंडों-पुरोहितों की कोई जरूरत नहीं होती इसमें। मंत्र-तंत्र का कोई ढकोसला नहीं। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, लोगों को दावतें देने का उत्सव, आसन्न ठंढे मौसम से पहले घरों-गलियों-कपङों के सफाई का उत्सव।
हर वो शख्स जो पुरबिया बयार में साँस लिया होगा, वो महसूस रहा होगा, अभी बसमतिया भात के खुशबू को। इन शहरों ने सिर्फ़ गाँवों को ही नहीं मारा है, बल्कि हमारे लोक-संस्कृतियों, लोक-उत्सवों को भी बेरहम मौत दिया है। खैर, जो अपने देस में होंगे, वो जिह्वा से भी आनंद को प्रस्तुत होंगे। हम और हमारे जैसे कुछ और अभागे, जो दूर देस में क़िस्मत-मेहनत आजमाने पङे हुवे हैं, छठ की शुभकामनाएँ भेजते हैं अपने देस को। आप हो सके तो एक मुट्ठी खुशबू हवा में छोङकर पच्छिम का रस्ता दिखला देना।
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