शनिवार, 27 सितंबर 2014

Bikhre Lafz-10 ; 24 October 2013

पैदा हुवा वो जब यहाँ,लेकर दुर्भाग्य हाथ में।
क़र्ज़ में डूबा हर तिनका,मिला उसे उपहार में।।

सपनों की खेती करने,पथ पर निकला वो मेहनतकश।
लाया उधार पर कुछ पैसे,निज जीवन को गिरवी रखकर।।

फाड़कर धरती का सीना,बो दिया कुछ बीज उसने।
हड्डियों का हल बनाकर,सींचा फिर अपने लहू से।।

पर हाय! विधाता है तुमको,क्या शर्म जरा भी न आया।
मेहनतकश मजबूरों की,अस्मत को तुने जला डाला।।

दया नहीं है तुममे अगर,ले लो फिर मानव से उधार।
ये प्रश्नचिन्ह लो लगाता हूँ,तुम नहीं हो बेहद उदार।।

कहलाता तो है धरतीपुत्र,पर उसके बच्चे रोते हैं।
रोटी-रोटी चिल्ला-चिल्ला,भूखे-नंगे जमीं पर सोते हैं।।

छोड़ गया एक दिन जहां,दे बेटे को पैतृक उपहार।
घर-घर में था सुखा मातम,पर खुश था बहुत वो साहूकार।।

देता हूँ चुनौती फिर तुझको,मानूंगा तभी तुझे मैं भगवान्।
अगर अस्तित्व है तेरा तो,बनकर दिखला दे एक किसान।।

अंत में भूमिपुत्रों को समर्पित एक कवि के कोमल ह्रदय की संवेदना...
"आँखों में उमड़ते अश्रुमेघ,आवाज गले की रुंधी है..
इस कविता का हर एक शब्द,अपराध-बोध से बंधी है.."

©:- सुभाष सिंह 'सुमन'
(24 अप्रैल 2012)
 

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