शनिवार, 27 सितंबर 2014

Bikhre Lafz-15; 24 December 2013

सङक पर बेतहाशा दौङता वह वृद्ध, जो कि सही से दौङ पाने में भी असमर्थ है, पर पेट का सवाल है उसको दौङना ही होगा। स्काॅर्पियो में बैठे वो रईसज़ादे, जो रूक जाना अपने शान में गुस्ताखी समझते हैं, उस वृद्ध के मजबूरन मैराथन पर अट्टहास करते हैं। और दूसरे तरफ़ बस के खिङकी के पास बैठे हम, जो बस को रूकवा पाने में अक्षम हैं, मौन रूदन करते हैं।
महानगरीय समाज में ये एक सामान्य सी घटना है, पर बिहार के गाँव से कुछ बनने की लालसा लिए महानगर आए एक गँवार के आँसुओं का बाँध तोङने को यह पर्याप्त था। क्षमा श्रमजीवी देवता, आपके पैरों की धूलि को अपने मस्तक तक न पहुँचा सका। इस अक्षम इमोशनल गँवार का मौन प्रणाम स्वीकार करना। 

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