शनिवार, 1 नवंबर 2014

ताना-बाना

ईरान में एक औरत को फाँसी पर लटकाया जाता है। वजह, उसने बलात्कृत होने से बगावत कर दिया, और आत्मरक्षा में चाकू चला दिया।
हिन्दुस्तान के महाराष्ट्र में एक परिवार को टुकङों में काटकर रख दिया गया। वजह, वो एक दलित परिवार था।
मुजफ्फरनगर में एक लङकी को ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। वजह, लङकी ने अपने साथ हो रहे छेङछाङ का प्रतिरोध कर दिया।
क्या वाकई में हम सभ्य हुवे हैं? दुनियाभर के तमाम धर्मों ने हमें इतना ही धार्मिक बनाया है, कि हमारी आदमियत कम हो गयी है। धर्म के मठाधीश अभी भी कुतर्क खोजने में व्यस्त होंगे। सुंदरकांड के इस बदसुरत चौपाई को देखिए, "ढोल-गंवार-शूद्र-पशू-नारी, सकल ताङना के अधिकारी"। ऐसा नहीं लगता, कि तमाम धर्मों ने इसी चौपाई वाला रास्ता अख्तियार कर रखा है? क्या इन धर्मों को अब खारिज़ नहीं हो जाना चाहिए। बङे दार्शनिक अरस्तु ने कहा है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और यह सच भी है। मगर तमाम धर्मों-मज़हबों ने अब तलक समाज को असामाजिक बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
बाक़ी, कुछ ऐसे भी स्वघोषित बौद्धिक होंगे, जिन्हें इस पोस्ट से प्रचंड मिर्ची लगेगी। खैर, फतवेबाजों का भी स्वागत।

कोई टिप्पणी नहीं: