सभ्यताओं के विकास से सिर्फ़ यही हासिल हुवा है कि हम अब और असभ्य हो गए हैं. पहले हमने सुकरात को मारा, बुद्ध को मारा, महावीर को मारा और अब हर रोज सुकरातों-बुद्धों-महावीरों को मार रहे हैं. सभ्य दिखने वाले बर्बर हो गए हैं हम. आस्था ने हमेशा ही सभ्यता को पराजित किया है. इस आस्थारूपी विकृति से कभी नहीं उबर सकेगा ये समाज और इसीलिए कभी भी सभ्य नहीं हो सकेगा..
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